Wednesday, October 27, 2021

 

 

 

बिहार चुनाव, मुसलमान और हिस्सेदारी

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काशिफ युसूफ –

राजनीति में हिस्सेदारी को लेकर मुस्लिम समाज में यदा कदा आवाज़ उठती रहती है लेकिन चुनाव के समय ये आवाज़ साम्प्रदायिकता और जातिवाद के आगे दम तोड़ देती है।  भारत के इतिहास में बहोत कम ऐसे चुनाव रहे हैं जिसमे मुसलमानो ने अपने विकास और हिस्सेदारी के मुद्दे पर वोट किया है।

मुसलमानो को चुनाव के समय अचानक ही धर्मनिरपेक्ष्ता का सिपाही बना दिया जाता है।  ऐसा लगता है के संविधान में निहित तमाम मूल्यों की रक्षा करने की पूरी ज़िम्मेदारी अल्पसंख्यकों पर ही है।  कितना शर्मनाक है की दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र की दूसरी सबसे बड़ी आबादी इक्कीसवीं सदी में भी डर के साये में वोट करती है।

सबसे बड़ा मिथ्या जो कहीं न कहीं  कांग्रेस जैसी सेक्युलर पार्टियों ने मुसलमानो के दिल में डाल रखा है वो ये के जैसे मुसलमानो के वोट के कारण ही हिन्दुस्तान एक सेक्युलर मुल्क है और अगर मुसलमान कांग्रेस और उस जैसी नाम निहाद जिताऊ सेक्युलर पार्टियों को वोट देकर भाजपा को हराने का काम न करे तो भारत एक  हिन्दू राष्ट्र बन जाएगा।  मुसलमान इस मिथ्या से बाहर नहीं निकल पा रहा है।  वो अभी तक इतना भी नहीं समझ पाया है के भारत यहाँ के मुसलमानो के कारण नहीं बल्कि यहाँ के हिन्दुओं के कारण एक सेक्युलर देश है।

अगर भारत को धर्मनिरपेक्ष बनाये रखने के लिये भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर लालू और नितीश गठबंधन की पार्टियों वोट देना इतना ही ज़रूरी होता तो व्यवहारिक तौर पर लालू और नितीश से ज़्यादा सेक्युलर लेफ्ट पार्टियां बिहार में चुनाओ लड़ने के बजाये भाजपा के विरोध में सिर्फ लालू और नितीश को जिताने की अपील कर रहे होते।  ये मुल्क ना तो लालू -नितीश के कारण सेक्युलर है और ना ही भाजपा इसे  हिन्दू राष्ट्र बनाने की ताक़त रखती है. जबतक मुसलमान इस बात को नहीं समझेगा तबतक मुसलमानो की राजनीति हिस्सेदारी और विकास के मुद्दे को मुख्या मुद्दा बना कर नहीं की जा सकेगी।

एक मिथ्या और भी है।  जब आरएसएस , भाजपा , मुशावरत , जमीयत इ  उलमा जैसी संगठनो का कार्यकर्ता इंग्लैंड की नागरिकता लेता है तो उसे एक बार भी ऐसा नहीं महसूस होता है के वो किसी सेक्युलर या हिन्दू राष्ट्र की नागरिकता नहीं ले रहा बल्कि एक ईसाई राष्ट्र की नागरिकता ले रहा है।  नेपाल को हिन्दू राष्ट्र से सेक्युलर राष्ट्र बनाने के लिया वहां के मुसलमानो ने कभी कोई एक भी बैठक नहीं की।  वहाँ के हिन्दुओं ने ही नेपाल को एक सेक्युलर राष्ट्र बनाया।  यूरोप और अमरीका में मुस्लिम या दूसरे अल्पसंख्यक लोगों की आबादी भारत से बहोत काम है।  फिर भी यूरोप  और अमरीका के ज़्यादातर देश सेक्युलर हैं।  ये सभी देश इसलिए सेक्युलर हैं क्योंकि यहाँ की ईसाई आबादी देश को सेक्युलर रखना चाहती है।  इन सब चीज़ों को अगर गौर से देखा जाये तो ऐसा महसूस होता है के हिन्दू राष्ट्र बनाने और धर्मनिरपेक्षता को बचाये रखने की राजनीति सिर्फ हिन्दू कट्टरवादी  और मुस्लिम वोट बैंक बनाने की राजनीति से ज़्यादा और कुछ भी नहीं हैं लेकिन हिन्दुओं और मुसलमानो का एक बड़ा तब्क़ा इस राजनीती में आसानी से फंस जाता है इसलिए नरेंद्र मोदी, लालू , नितीश जैसे नेता इस राजनीती से फायदा उठाते हैं।

अगर हाल  में  हुए बिहार विधानसभा के चुनाओ और महागठबंधन की बिहार सरकार के   परिपेक्ष में देखें तो धर्मनिर्पेछ्ता की चैम्पियन इस सरकार ने १७% आबादी वाले मुसलमानो का ८६% मुस्लिम वोट लिया लेकिन सरकार में सिर्फ ४ मुसलमानो को मंत्री बनाया गया।  वहीँ १२% आबादी वाले यादवों ने महागठबंधन को सिर्फ ६४ % वोट दिया लेकिन ७ यादवों को काफी महत्पूर्ण मंत्रालय देने का काम किया गया. सरकार के गठन में ही जब इतना भेदभाव है तो आगे क्या होगा ये कहना थोड़ा  मुश्किल है।

एक खुली चुनौती नितीश कुमार के लिए भी है. राजद से दो और जद यु से सिर्फ एक मुसलमान के मंत्री बनने से कहीं न कहीं ये पैग़ाम भी जा रहा है के मुसलमानो के नेता अभी भी लालू यादव ही हैं नाके नितीश कुमार। नितीश कुमार अपनी राजनितिक पारी में ऐसी चूक कैसे कर रहे हैं ये समझ पाना मुश्किल है. जहाँ इतने सारे मंत्री बने हैं वहां जद यु के कोटे से एक और मुस्लिम मंत्री जोड़ लेना इतना भी मुश्किल तो नहीं है. अपने कोटे से एक कम मुस्लिम मंत्री देकर नितीश कुमार मुस्लिम वोट पर अपनी दावेदारी को कमज़ोर कर रहे हैं।

बाक़ी रही बात आम मुसलमानो की तो इसपर कुछ  भी कहना अभी जल्दबाज़ी होगी।  उर्दू बांग्ला टीचर्स , मदरसा टीचर्स , वक़्फ़ के मसले मुंह खोले खड़े हैं।  हालांकि अल्पसंख्यक मंत्रालय में अब्दुल ग़फ़ूर और शिछा  मंत्रालय में डॉ. अशोक चौधरी जैसे मंत्रियों के आने से लोगों को कुछ अछा होने उम्मीद तो है लेकिन धरातल पर क्या उतर पायेगा ये तो आने वाला समये ही बतायेगा।  सबसे बड़ी चुनौती अब्दुल ग़फ़ूर के लीये है।  अपनी साफ़ सुथरी और अवाम दोस्त छवि को मंत्री पद पर रहते हुए अब्दुल ग़फ़ूर कितना बचा पाएंगे ये उनके लिए एक चुनौती है । वैसे अल्पसंख्यक मंत्री ने पहले दिन ही अल्पसंख्यक छात्रों को मिलने वाले स्कालरशिप की जिला स्तरिये परिस्थिती का जायज़ा लेने का आदेश अपने स्टाफ को देकर काम में गति लाने की कोशिश की है लेकिन बाबुओं के जाल में फंसी फाइल्स को मंत्री कितनी तेज़ी दे सकेंगे ये अगले कुच्छ महीनो में पता चल पायेगा।

चुनौतियों को स्वीकार करने की छमता रखने वाले नितीश कुमार ने शराब बंदी का ऐलान करके सिर्फ अपनी हि नहीं बल्कि बारी सिद्दीकी और जलील मस्तान की मुश्किलों को भी काफी बढ़ा दिया है।  ऐसे में इन मंत्रियों के कार्यकलाप पर मीडिया और आम जनमानस की और भी कड़ी नज़र हो गयी है. कुच्छ लोग इसे इस तौर पर देख रहे हैं के मलाईदार मंत्रालय अपने चहेतों को और चुनौती वाले मंत्रालय मुस्लिम और दलित मंत्रियों को देने का काम किया गया है। हालांकि इस  नजरिया को पूरी तरह सही नहीं कहा जा सकता।

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