ध्रुव गुप्त: ‘चांद को छेड़ने से बेहतर होगा, पृथ्वी की चिंता करें’

7:52 pm Published by:-Hindi News

चंद्रयान-दो की चांद की सतह के बिल्कुल पास पहुंचकर आख़िरी पलों में उसे छू न पाने की असफलता कोई बड़ा मसला नहीं है।इश्क़ की तरह विज्ञान भी ऐसी कई असफल कोशिशों से ही मंज़िल तक पहुंचता है। हमारे वैज्ञानिक सक्षम हैं और भविष्य में वे चांद ही नहीं, और कई-कई ग्रहों-उपग्रहों तक पहुंच सकते हैं।

सवाल इतना भर है कि चांद पर पहुंचकर हम हासिल क्या करेंगे ? यह संतोष कि हम चांद पर पहुंचने वाले चौथे या पांचवें देश बन गए ? या यह दम्भ कि हमारी इस सफलता से हमारा कोई दुश्मन मुल्क़ जल-भुनकर खाक़ हो जाएगा ? अगर नहीं तो यह जानकर कि चांद के किसी कोने में पानी का भंडार है, हमें क्या मिलेगा ? क्या हम टंकियों और बोतलों में भरकर उसे पृथ्वी पर लाएंगे ?

तब चांद के एक बोतल पानी की क़ीमत इतनी होगी कि हमारे-आपके जैसे लोगों के घर बिक जायं। वहां खनिजों और गैसों के भंडार का पता भी मिल जाय तो उन्हें पृथ्वी पर लाने में जितना खर्च लगेगा उतने में तो हम पृथ्वी पर ही खनिजों के कई भंडार खोज निकालेंगे। क्या हमें चांद पर अपनी पृथ्वी के कुछ खाए-अघाए लोगों की कालोनियां बसानी हैं ? तब ये लोग पृथ्वी की तरह चांद और उसके पर्यावरण को भी गंदा कर डालेंगे। वह पृथ्वी हो या चांद, उसकी प्रकृति से खेलने के नतीजें कितने ख़तरनाक हो सकते हैं, यह हम सब देख और महसूस कर रहे हैं।

sun moon earth

चांद को बेवज़ह छेड़ने से बेहतर होगा कि हम तेजी से विनाश की ओर बढ़ती हुई अपनी पृथ्वी की उम्र थोड़ी और बढ़ाने का जतन करें। उसके वन और वृक्ष उसे वापस लौटाकर। उसकी जहरीली होती हवा में प्राण फूंककर। उसकी नदियों को अविरल और निर्मल बनाकर। यह पृथ्वी बचेगी तो हम बचेंगे और हमारी आनेवाली पीढ़ियां बचेंगी। हम अपनी पृथ्वी की चिंता करें और चांद को उसके हाल पर छोड़ दें ! चांद हमारे बगैर ज्यादा सौम्य, शीतल, निर्मल और सुंदर है।

ख़ुशबू में है, आहट में है, धड़कन में रहता है चांद
हाथ की ज़द में चांद नहीं है, चांद असर में रहता है !

ध्रुव गुप्त

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