1992 में ”जय श्रीराम” का नारा देकर बाबरी मस्जिद का विध्‍वंस किया गया जिसने भारतीय जनता पार्टी को मुख्‍यधारा के दलों में स्‍थापित कर दिया और आज केंद्र में उसकी बहुमत की सरकार है। इन 23 वर्षों में, खासकर गोधरा के बाद, यह नारा राजनीतिक रूप से काफी कमज़ोर पड़ चुका है। याद करिए, तीन साल पहले जब वरुण गांधी ने पीलीभीत की एक जनसभा में यह नारा लगाया था तो उनकी कैसी चौतरफा भद्द पिटी थी।

आरएसएस/वीएचपी जैसे हिंदू संगठन शुरू से समझते थे कि राम के नाम में बाबरी विध्‍वंस के बाद बहुत तेल नहीं बचा है। इसीलिए असीमानंद ने 1996 में जब अंडमान से अपना ”घर वापसी” का काम शुरू किया, बाद में झाबुआ आकर शबरीधाम स्‍थापित किया और शबरी कुम्‍भ लगाने लगे, तो उनका सबसे बड़ा राजनीतिक औज़ार राम नहीं, हनुमान का नाम और तस्‍वीर थी। हिंदू संगठनों, खासकर धर्म जागरण मंच आदि की राजनीति को ट्रैक करने वाले जानते हैं कि बीते 20 वर्षों में हनुमान और शबरी की जोड़ी ने आदिवासियों को हिंदू फोल्‍ड में लाने में कितना अहम योगदान दिया है।

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असीमानंद आदिवासियों में हनुमान की फोटो बांटते थे और मुरारी बापू रामकथा सुनाकर हनुमान बनने की प्रेरणा देते थे। यह संयोग नहीं है कि नियमगिरि के दुर्लभ डोंगरिया आदिवासियों के बीच सबसे पहली पाउचबंद रेडीमेड खैनी जो पहुंची, उसका नाम ”हनुमान खैनी” था जिसके कवर पर हनुमान बने थे।

बजरंगी भाईजान में बजरंगी का किरदार अगर हनुमान का है तो मुन्‍नी यानी शाहिदा का किरदार शबरी का है। फिल्‍म का हनुमान (सलमान) फिल्‍मी शबरी (हर्षाली) की भौतिक रूप से तो ”घर वापसी” कराता ही है, लेकिन अंत में शाहिदा के मुंह से निकला ”जय श्रीराम” संघ की वास्‍तविक ”घर वापसी” का असल राजनीतिक मुहावरा है।

यह फिल्‍म अभी धीरे-धीरे मेरे सामने खुल रही है। पता नहीं ऐसे कितने ”सांयोगिक” साक्ष्‍य आगे सामने आएंगे जो साबित करेंगे कि यह फिल्‍म नहीं, बाकायदा तराशा गया एक राजनीतिक टूल है। मेरी बात से आप यह कहते हुए असहमत हो सकते हैं कि फिल्‍म के लक्षित दर्शक आदिवासी नहीं हैं, लेकिन मैं इतना ज़रूर कहूंगा कि यह फिल्‍म ”घर वापसी” को बहुत महीन तरीके से मध्‍यवर्ग में स्‍वीकार्यता दिलवाने का उद्देश्‍य रखती है

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