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इस धरती पर मानव ने अत्याचार के विभिन्न रूप देखें हैं, इतिहास में वह दिन भी देखा है कि फिलिस्तीन की धरती पर सात समुद्र पार से कुछ लोग आए, फिलिस्तीनियों के देश में “इस्राइल” नामक एक देश का निर्माण किया और अमेरिका सहित पूरी दुनिया ने उसे देश के रूप में स्वीकार भी कर लिया। यह तो ऐसा ही हुआ कि किसी के घर में कोई ज़बरदस्ती घुस कर उसके बीच घर में अपना घर बना ले और पूरे साहस के साथ उसे अपना अधिकार समझने लगे।

जब फिलिस्तीनियों ने इसके विरोध में आवाज़ें उठाईं तो उनकी आवज़ों को दबाने के लिए उनके ख़ूनों की होली खेली गई, और लाखों की संख्या में लोगों को मौत की नींद सुला दिया गया और 65 वर्षों से अब तक फिलिस्तीनियों पर उनका अत्याचार निरंतर जारी है।

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29 नवम्बर फिलीस्तीनी जनता के साथ एकजुटता हेतु अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या दुनिया ने आज तक फिलीस्तीनी जनता के साथ न्याय किया, क्या यह दिन जलते पर नमक छिड़कने और घाव को अधिक हरा करने के समान नहीं ?

यहूद कौन हैं ?

यहूद जिनको इस्राईली भी कहा जाता है यूसुफ अलैहिस्सलाम के बाप याक़ूब अलैहिस्सलाम की ओर निस्बत करते हैं जिनकी उपाधि इस्राईल थी। जब युसूफ अलैहिस्सलाम को मिस्र का खाद मंत्री बनाया गया तो उन्हों ने अपने पूरे परिवार को मिस्र में बुला कर बसा लिया। कुछ दिनों के बाद मिस्र पर फ़िरऔन का शासन आया तो उसने इस्राइलियों को अपना दास बना लिया और उन पर विभिन्न प्रकार का अत्याचार करने लगे, अल्लाह ने उन्हीं के बीच मूसा अलैहिस्सलाम को पैदा किया जो जवान होने के बाद इस्राइलियों को लेकर रात के समय निकल पड़े, अहमर सागर के निकट पहुंचे तो अल्लाह ने समुद्र में उनके लिए बारह रास्ते बना दिया जिनको पार करके बनू इस्राईल सुरक्षित निकल गए और उसी सागर में फिर्औन अपनी सेना समित डूब कर मर गया। उसके बाद यहूद पर अल्लाह के विभिन्न प्रकार के उपकार होते रहे जिसका वर्णन सूरः बक़रा में विस्तृत से हुआ है।

यहूद की बेवफ़ाईः

यहूद का इतिहास पहले दिन से बेवफाई, देशद्रोह और ग़द्दारी से भरा हुआ है. पूरे मानव इतिहास में शायद ऐसा समुदाय पैदा न हुआ जो अल्लाह की अपार कृपा और दया पाने के बावजूद लगातार विश्वासघात, जिद्द और हठधर्मी के पथ पर चलता रहा हो, इसी लिए उन पर अल्लाह का प्रकोप उतरा और विभिन्न प्रकार की यातनाओं से दोचार किए गए बल्कि कितने पशुओं के रूप में बदल दिए गए. फिर हर युग में उस समय के हिटलर ने उन पर ऐसे ऐसे अत्याचार किए जिन्हें सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, दर दर की ठोकरें खाईं , फिर भी उनकी आदत न बदली।

जब इस्लाम का सुर्य यसरिब की घाटी में उदय हुआ तो यहूद मानो उसी दिन से हाथ धो कर इस्लाम के पीछे पड़ गए, मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ किए गए समझौतों को तोड़ा , मुसलमानों को कष्ट पहुंचाने का कारण बने, इस्लाम लहलहाते पौधे को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिये विभिन्न जनजातियों को उकसाकर आपके खिलाफ युद्ध के मैदान में उतारा, जब उनके पैरों से जमीन खिसकती नजर आई तो अब्दुल्लाह बिन सबा और उन के जैसे अन्य यहूदियों नें इस्लाम स्वीकार करने के बहाने पाखंड का लुबादा ओढ़ लिया ताकि मुसलमानों के भीतर से उनकी एकता को भंग कर दिया जाए, अतः हम देखते हैं कि मुहम्मद सल्ल. के देहांत के बाद सिफ्फीन और जमल के युद्ध, हज़रत उसमान और हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हुमा की शहादत और फिर इस्लाम में विभिन्न समुदायों का पैदा होना ‘यह सब यहूदी मानसिकता का ही षड़यंत्र है। .

शैतान के बाद व्यवस्थित योजना और तैयारी के साथ काम करने वाली क़ौम अगर दुनिया में है तो वह ” यहूदी क़ौम ” है, उनके महत्वाकांक्षा हमेशा जवान रहते हैं, उनका सपना है पूरी दुनिया को अपने अधीन करना, जिसकी निर्दिष्ट उन्होंने सन 1897 इसवी में स्विट्जरलैंड में आयोजित यहूदी विश्व कांफ्रेंस के दस्तावेज़ ” ज़ायोनी हकीमों के राजनीतिक प्रोटोकॉल ” में स्पष्ट रूप में की है।

बैतुल मक़दिस यहूद और मुसलमानः

बैतुल मुक़द्दस को हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने बनाया था जो इस्लाम के संदेष्टाओं में से एक संदेष्टा हैं, हम मुसलमानों के लिए बैतुल मुक़द्दस सामान्य मस्जिदों के जैसे नहीं बल्कि इससे हमारे ईमान और आस्था का संबंध है, उस से हमें वैसी ही मुहब्बत होनी चाहिए जैसी मुहब्बत काबा और मस्जिदे नबवी से है क्योंकि बैतुल मुक़द्दस धरती पर बनाई जाने वाली दूसरी मस्जिद है, मुसलमानों का पहला क़िबला है, जहां से नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को मेराज कराया गया था, जिस में एक नमाज़ अदा करने से दो सौ पचास नमाज़ो का पुण्य मिलता है, जिसकी भूमि को धन्य और बरकत वाली धरती घोषित किया गया है , और जिस में दज्जाल का प्रवेश वर्जित है.

यहूदियों ने मूसा अलैहिस्सलाम और उन से पहले जितने भी संदेष्टा आए सब्हों की शिक्षाओं में परिवर्तन किया और “यहूदियत” के नाम से एक नये धर्म का शिलान्यास रखा जब कि मुसलमान सारे संदेष्टाओं पर ईमान रखते हैं और उनका सम्मान करते हैं इस प्रकार बैतुल मुक़द्दस मुसलमानों का है उसमें यहूद का कोई अधिकार नहीं।

दूसरे खलीफा उमार फारूक़ रज़ि. की दूरदर्शिताः

यही कारण था कि यहूदियत षड़यंत्र से परिचित दूसरे खलीफा उमर फारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु जब बैतुल मुक़द्दस पर विजय पाने के बाद इलिया के निवासियों से समझौते की शर्तें तय की थीं तो एक शर्त यह रखी थी कि बैतुल मुक़द्दस में ईसाईयों के साथ कोई यहूदी निवास ऐख़तियार नहीं करेगा। .

यह शर्त दूसरे खलीफा की दूरदर्शिता और बुद्धिमत्ता पर आधारित थी कि ऐसा न हो कि यहूद अपने षड़यंत्र से इस धरती राजनीतिक उल्लू सीधा करने का माध्यम बना लें, अतः इतिहास बताता है कि तेरहवीं शताब्दी तक एक यहूदी भी फ़िलिस्तीन में न था।

फिलिस्तीन की ओर यहूद का आगमनः

सन 1267 इसवी में पहली बार दो यहूदी आए, उसके बाद से ही फिलिस्तीन में यहूदियों का आगमन शुरू हो गया और हम लापरवाही और संवेदी की चादर ताने सोए रहे. फिर जब सन् 1887 में फ़िलिस्तीन पर कब्जा करने के उद्देश्य से ” ज़ायोनी आंदोलन ” का गठन हुआ तो यहूदी पूंजीपतियों ने इस आंदोलन का समर्थन किया, मक्कार यहूदियों ने मुंह मांगी कीमतें देकर मुसलमानों की जमीनें खरीदीं , भवन बनाए, यहूदियों से फ़िलिस्तीन की ओर हिजरत करने की गुज़ारिश की गई।

“इस्राईल” की स्थापना और यहूदियों की बर्बरताः

अंततः जब ज़मीन उपजाऊ हो गई तो इसराइल ने 14 मई 1948 मे मुसलमानों से छीनी हुई ज़मीन पर सहयूनी राज्य का निमार्ण कर दिया। जिसने न जाने अब तक कितने बच्चों को अनाथ बनाया है, कितनी पत्नियों को रांण्ड किया है, कितनी लड़कियों के सुहाग लूटे हैं और कितनी माओं की मम्ता का खून किया है लेकिन इसराइल की यह बर्बरता मात्र एक साधन है, मंजिल नहीं. मंजिल तो वह है जिसका उल्लेख इसराइली संसद के भवन पर अंकित है “हे इस्राएल तेरी हदें नील से फ़ुरात तक हैं ” जी हाँ! इसराइल का उद्देश्य पूरी दुनिया को अपने अधीन करना है , लेकिन उसके महत्वाकांक्षा में मिस्र से लेकर शाम और मदीना सहित हेजाज़ पहले नम्बर पर हैं जिसकी शुरुआत मस्जिदे अक्सा के विध्वंस और इस में सुलैमान अलैहिस्सलाम के हैकल के निर्माण से है. इस सपने को साकार करने के लिये विभिन्न तैयारियां की जा चुकी हैं अब केवल समय का इंतजार है ।