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- सूरज कुमार बौद्ध, राष्ट्रीय मुख्य महासचिव, भारतीय मूलनिवासी संगठन

बहुजन जाग रहा है

माना वक़्त तुम्हारा है
ताज तुम्हारा है।
माना सत्ता प्रतिष्ठान पर
राज तुम्हारा है।
पर नहीं साहब नहीं
ज्यादा दिन तक नहीं।

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यह जो तुम्हारी गुंडागर्दी है न
हजारों साल की चांदनी है।
हम मानते हैं अपनी हार को
मसलन हम हारे हुए हैं
क्योंकि हम जानकर तो थे
पर तुम्हारी तरह नीच नहीं।
इतनी धूर्तता हम लाएं कैसे ?
तेरा असली चेहरा दिखाएं कैसे ?

सेवक बने रहे हमारे पुरखे
सात्विक बन सेवा करते रहे।
जंगल के सीधे साधे पेड़ 
सबसे पहले काटे जाते हैं
शायद यही हम भूल गए थे।
मगर हम समझने लगे हैं
तुम्हारी शातिर सोच को,
कोर कल्पित देवों की खोज को।

आओ अब हमारी शोर सुनो
एक तरफ नहीं चहुंओर सुनो।
कलमबद्ध हैं हम, संगठबद्ध हैं हम
पुरखों के दर्द में सराबोर हैं हम।
उगते हुए सूरज में अनुराग रहा है,
जाग रहा है बहुजन, जाग रहा है।

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