बादशाहों में एक बादशाह ऐसा भी हुआ जिसकी बादशाही के आगे इतिहास के सारे बादशाहों की बादशाही फीकी पढ़ जाती है और वो बादशाह थे..खान अब्दुल गफ्फार खान जिन्हें हिन्दुस्तान में बादशाह खान, पाकिस्तान-अफगानिस्तान में बाचा खान और दुनिया फ्रंटियर गांधी के नाम से जानती है।

“इस्लाम के अहिंसक सिपाही” नाम से मशहूर खुदाई खिदमतगार या लालकुर्ती आंदोलन के प्रणेता और संस्थापक अहिंसा के पुजारी बाचा खान, महात्मा गांधी के व्यक्तिगत और राजनैतिक मित्र थे। पठान कौम, जिसे आम तौर पर लड़ाकू समझा जाता है, को अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले बाचा खान के साथ इतिहास ने भी इन्साफ नहीं किया। 98 साल की उम्र में 20 जनवरी 1988 को अंतिम साँस लेने के पूर्व बीमार चल रहे बाचा खान इलाज के इंडिया आते रहते थे, उनके अन्तिम दिनों में जब डाक्टरों में हाथ खड़े कर दिए थे तब भारत सरकार ने उन्हें उनके अभिन्न मित्र महात्मा गांधी के नजदीक ही दफन किये जाने की पेशकश की थी लेकिन अपनी मिट्टी से बेइन्तहा मोहब्बत करने वाले सीमांत गांधी ने अपनी मातृ भूमि जलालाबाद, अफगानिस्तान में दफन होने की ख्वाईश जताई थी।

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बाचा खान की हैसियत और कद का अंदाजा लगाने के लिए इतना बताना काफी होगा कि जलालाबाद में आज ही के दिन दूसरी दुनिया के सफर को निकले बाचा खान की मैय्यत में प्रोटोकॉल को अपवाद में रख कर भारत के प्रधानमन्त्री राजीव गांधी सहित अन्य राष्ट्रीय नेता शामिल हुए थे। लोग उनकी मैय्यत में शामिल हो सके इसके लिए उस दिन पेशावर (पाकिस्तान) और जलालाबाद (अफगानिस्तान) के बीच वीजा की औपचारिकता खत्म की गयी थी। यहां तक की उस दौरान चल रहे रूस-अफगान युद्ध में उनकी अंतिम यात्रा की सहूलियत के लिए एक दिन का युद्ध विराम तक घोषित किया गया था। हजारों लोग पाकिस्तान से सीमा पार कर जलालाबाद गये थेऔर अहिंसा के इस बादशाह को श्रद्धाञ्जलि दी थी।
अहिंसा के पुजारी दूसरे गांधी सीमांत गांधी को लाखों सलाम!

महेद्र दुबे की फेसबुक वाल से 

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