रवीश कुमार

मोहम्मद अज़ीज़ महान गायक थे। मोहम्मद रफ़ी के साये में देखे जाने के कारण उनकी गायकी को वो पहचान न मिली जिसकी हकदार थी। सुनने वालों की दुनिया में मोहम्मद अज़ीज़ ने कोई छोटा मकाम हासिल नहीं किया था। मकाम और पहचान के बीच कुछ फ़ासले होते हैं जो उनकी आवाज़ तय नहीं कर पाई। मैं अक्सर मोहम्मद अज़ीज़ को सुनता हूं, पाता हूं कि अज़ीज़ हिन्दी सिनेमा की गायकी की परंपरा में पहले गायक हैं जिनकी आवाज़ का अनुशासन आता तो था शास्त्रीय परंपरा से मगर शब्दों का उच्चारण मेहनतकशों की ज़िंदगानी से आता था।अस्सी और नब्बे के दशक तक आते-आते हिन्दी और उर्दू ज़ुबान की कुलीन रवायतें ध्वस्त हो चुकी थीं। इसे बोलने वाले लोग अपनी ज़ुबानी कुलीनता को छोड़ अंग्रेज़ी के पीछे भाग चुके थे। उनके पीछे गांव से कस्बों और कस्बों से शहरों की तरफ मेहनत मजूरी के लिए भाग रहे थे। लोगों के पास जो उर्दू और हिन्दी थी वो वैसी न थी जो किताबों की थी। जो कुलीनों की थी। इन प्रदेशों की शिक्षा का ढांचा बर्बाद हो चुका था। इसलिए आप देखेंगे कि मोहम्मद अज़ीज़ कुछ शब्दों को बिल्कुल वैसे बोलते हैं जैसे उनके सुनने वाले बोलते होंगे। मोहम्मद अज़ीज़ की गायकी में उस समय के दो ज़ुबानों में आ चुकी ख़राबी के दस्तावेज़ हैं। आवारगी फिल्म का एक गाना है। बाली उमर ने मेरा हाल वो किया… इस गाने में निकला शब्द पर ऐसे ज़ोर देते हैं कि वह नीकला सुनाई देता है। डरता को डरिता की तरह उच्चारित करते हैं। दिल की दील कहते हैं।

नीकला न बाहर मैं तो शीशे के घर से

डरिता रहा मैं सारी दुनिया के डर से

1986 में एक फ़िल्म आई थी। मुद्दत। इस फिल्म में जया प्रदा और मिथुन हैं। इस गाने में ताजमहल का बेहद घटिया सेट बना है। घटिया कहना एक कुलीन नज़रिया है। हमने सौंदर्यबोध चंद लोगों की जागीर बना दी तो लोगों ने अपना सौंदर्यबोध बना लिया। उनके सौंदर्यबोध के हिसाब से ताजमहल का यह सेट भव्य है। यही उनकी भव्यता है जो शादी के मंडपों से लेकर बिना बिजली वाले गाँवों और छत वाले घरों में सुहागरात के पलंग की होती है।

बहरहाल इस सेट की पृष्ठभूमि में दोनों प्रेमी अपने प्रेम को ताजमहल सा यादगार बनाने की कल्पना पेश करते हैं। गाना इंदिवर लिखते हैं। अज़ीज़ चाहते तो अपने उच्चारणों को साध सकते थे मगर इस तरह से ढीला छोड़ देते हैं कि छोटी ई की मात्रा बड़ी ई की तरह सुनाई देती है। कामगारों की ज़ुबान पर शब्द अपनी तरह से तराशे जाते हैं। आप उस दौर को देखिए। पुराना एलिट ख़त्म हो चुका था। नया एलिट आने वाला था। जिसे शाहरुख़ को पसंद करना था और आई टी सेक्टर में काम करना था। अमरीका जाना था और लौट कर आना था।

अज़ीज़ इस गाने में फ़रमाते हैं…

तेरा बदन है संगे मरमर तू एक ज़िंदा ताजमहल है

झट से कैमरा जय प्रदा की सलमा-सितारों से बनाई गई सफेद साड़ी पर जा टिकता है। ताजमहल का रंग सफ़ेद है। जया प्रदा की साड़ी सफेद है। ताजमहल महंगा है। साड़ी सस्ती है। सफ़ेद साड़ी से सफ़ेद ताजमहल को विस्थापित किया जाता है। वैसे इस गाने में जया प्रदा कई रंग की साड़ी पहनती हैं। लेकिन जैसे ही ज़िक्र आता है ‘तेरा बदन है संगे मरमर तू एक ज़िंदा ताजमहल है’, जया प्रदा को सफेद साड़ी में दिखाया जाता है। जब महबूबा ही अपने आप में ताजमहल है और उसका बदन संगमरमर का है तो फिर कई साल और अरबों रुपये लगा कर ताजमहल बनाने का ख़्वाब क्यों। शाही कल्पना आम जीवन में कैसा रुप लेती है, जो रुपक ताजमहल का तो चुनता है मगर इमारत ताजमहल की नहीं चुनता है। यहीं पर महानतम मोहम्मद अज़ीज़ उस विकल्प को आवाज़ देते हैं। उनकी आवाज़ का रुपक रफ़ी की तरह शास्त्रीय है मगर उच्चारण शास्त्रीय नहीं है।

प्यार हमारा अमर रहेगा, याद करेगा जहां

तू मुमताज़ है मेरे ख़्वाबों को, मैं तेरा शाहेजहां।

शाहजहां को ख़ास तरह से शाहेजहां कहते हैं। आशा भोंसले भी शाहेजहां कहती हैं। हम ताजमहल के तसव्वुर को नासुर में बदलते देखते हैं लेकिन दौर ऐसा है कि यही अब नया ख़्वाब है। नया तसव्वुर है।

भारत के लोकतंत्र की जो भी कल्पना थी वो एक कुलीन कल्पना थी। वो अब ख़त्म हो चुकी है।अस्सी के दशक में भारत का लोकतंत्र कई तरह के उतार-चढ़ावों से गुज़र रहा था मगर ख़त्म नहीं हुआ। सरकारें गिरती थीं तो सिस्टम में इतना दम था कि नई सरकारें भी बन जाती थीं।अदालतों में बैठे जजों की रीढ़ हुआ करती थी। मुल्क पर नेता और उद्योगपति के गिरोह का कब्ज़ा नहीं हुआ था। ठीक उसी तरह से जैसे अज़ीज़ के उच्चारण बिगड़े हुए थे मगर गाने की शैली में में शास्त्रीयता बची हुई थी। मोहम्मद अज़ीज़ की महानता इस बात में थी कि उन्होंने अपनी भाषा को ज़माने के जैसा रहने दिया लेकिन गाने का क़ायदा भी बचा लिया। तभी ज़माने को लगा कि मोहम्मद अज़ीज़ नहीं हैं। ये रफ़ी हैं। जबकि वे रफ़ी नहीं थे। अज़ीज़ बता रहे थे कि क्या आने वाला है।

आराम से रहिए। आप सबके सहयोग से इस मुल्क का हर कायदा ध्वस्त किया जा चुका है। अदालत से लेकर आयोग तक हुज़ूर के मुलाज़िम लगते हैं और हुज़ूर उस सेठ के कारिंदे जिसकी दौलत के चंद टुकड़ों पर हिन्दुस्तान जैसे महान लोकतंत्र का मीडिया पलता है। और किसी से दूर भले न रहें लेकिन भारत के युवाओं से दूर रहिए। इस देश के ज़्यादातर युवाओं की न तो जवानी है और उनकी कहानी है। वे मुर्दा हो चुके हैं। जब भी उनमें धड़कन दिखे उनके मुँह पर हिन्दू-मुस्लिम टापिक का कोई फटा पर्चा दे मारिए। वे नफरत से लाश में बदल जाएंगे। ज़िंदा रहेंगे तो दंगाई हो जाएंगे। नेताओं ने समझ लिया है। ज़्यादातर युवा उनके इस नशे की खुराक के आदी हो चुक हैं। नेताओं ने अपने अधर्म पर चाँदी का वर्क चढ़ा दिया है। जिसका नाम धर्म है। इसलिए बेरोज़गारी से बिलखते सारे युवाओं को मंदिर के चंदे की वसूली में लगा दिया जाए। उनके ललाट पर धर्म का पताका बांध दिया जाए। उनके भीतर जादू सा असर होगा।

अब हिन्दुस्तान के खत्म होने का एलान करने की ज़रूरत नहीं है। अब अज़ीज़ के गाने में बची हुई शास्त्रीयता मिट्टी में मिल चुकी है। उनकी जगह अर्णब गोस्वामी नाम का एंकर रोज़ बहस करता है कि कांग्रेस पार्टी को बैन कर देना चाहिए। सवाल करने वालों को गद्दार करता है। पाकिस्तानी कहता है। अब सरकारें गिरती हैं तो नई नहीं बनती हैं बल्कि बनी हुई सरकारें गिर कर उसी की बनती हैं जो सेठ का कारिंदा है। गुलाम मीडिया के दौर का गाना अर्णब गा रहा है। जिसमें न तो शास्त्रीय परंपरा है और न शब्दों का ख़राब उच्चारण। शब्दों के मतलब ही बदल गए हैं। जय माँ भवानी कहने वाला डाकू ख़ुद को देशभक्त कह रहा है। सिनेमा ही बदल गया है। लोकतंत्र का ताजमहल नहीं है। अब उसका घटिया सेट लगाकर नाच गाना हो रहा है।

मोहम्मद अज़ीज़ ने बता दिया था कि उनकी गायकी का इशारा समझा जाए। जो बच सकता है बचा लिया जाए लेकिन लोगों ने अज़ीज़ को ग़ौर से नहीं सुना। आज वक्त है अज़ीज़ को सुनने का। पता चलेगा कि क्या ख़त्म हुआ था और क्या बचा रह गया था। इस गाने को सुनिए। प्रात: भजन सुनने के बाद नियमित रुप से सुनता हूं। आप भी सुना करें। कम से कम आप अपने सौंदर्यबोध(aesthetic) को ही जान जाएँगे। शर्तिया।