अयोध्या विवाद में सिर्फ मुस्लिमों से ही क्यों दावेदारी छोड़ने की उम्मीद, दूसरे पक्ष से क्यों नहीं?

11:34 am Published by:-Hindi News

बाबरी मस्जिद विवाद के निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को मध्यस्थता के लिए भेज दिया है, और आठ सप्ताह के भीतर रिपोर्ट देने का आदेश दिया है। जिन तीन लोगों को इस मामले की मध्यस्थता की ज़िम्मेदारी दी गई है उनमें जस्टिस कलीफुल्ला, श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू शामिल हैं। इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने कहा था कि यह मामला सिर्फ ज़मीन का विवाद नही है बल्कि आस्था से जुङा है। इस मामले मे मध्यस्थता कराने वाले ये तीनो लोग कितने सफल होंगे इसका फैसला तो वक्त ही करेगा लेकिन एक बात पूर्णतः साफ हो गई है कि देश की अदालत पूरी तरह निष्पक्ष नही है। अदालतें या तो दबाव मे काम कर रही है या फिर उनकी मंशा न्याय देने की नही है। एक पीङित जो अपने साथ हुऐ अन्याय पर ‘कोर्ट मे देख लेने की धमकी देता है’ अब वह क्या कहेगा? क्या अब वह कहेगा आई विल सी यू आऊट ऑफ कोर्ट ? बाबरी मस्जिद पर 2010 मे इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला भी अजीब ओ गरीब था लेकिन एक उम्मीद बाकी थी कि सुप्रीम कोर्ट ‘न्याय’ करेगा। कुछ लोगो का मानना है कि मुसलमानो को बाबरी मस्जिद पर अपनी दावेदारी छोङ देनी चाहिये, सवाल यह है कि यह सवाल मुसलमानो से ही क्यों ? यह सवाल दूसरे पक्ष से भी तो किया जा सकता है, या फिर मान लिया जाऐ कि भारतीय लोकतांत्रिक समाज मे त्याग सिर्फ कमज़ोर वर्ग से ही मांगा जाता है, और बहुसंख्यक वर्ग को त्याग करने की जरूरत नही क्योंकि वह वर्ग अदालतो पर ‘दबाव’ बनाने का माद्दा रखता है?

एक बुद्धीजीवी वर्ग ऐसा भी है जिसका मानना है कि विवादित स्थल पर अस्पताल, काॅलेज, यूनीवर्सिटी बना देनी चाहिये। सवाल यहीं से पैदा होता है अगर विवादित स्थल पर अस्पताल काॅलेज बना दिया जाता है क्या इसे न्याय के रूप मे देखा जा सकता है ? क्या आप कह सकते हैं कि बाबरी मस्जिद मामले में भारतीय न्यायपालिका ने इंसाफ किया है ? आप विश्व समुदाय से आंख मिला पाएंगे? आप कह पाएंगे कि आपने भारतीय संतों के साथ इंसाफ किया है? क्या आप कह पाएंगे कि आपका न्याय तंत्र आपके देश के बहुसंख्यक समाज के उग्र वर्ग के दबाव मे नही आया? नहीं क्योंकि यह आप भी जानते हैं कि विवादित स्थल पर कोई स्कूल कॉलेज या यूनिवर्सिटी बना देना पीड़ित समाज को न्याय देना नहीं है बल्कि समझौता करना है समझौता करने और न्याय देने में जमीन आसमान का फर्क है इसीलिए अदालतों का वजूद है। अगर अदालते भी न्याय देने के बजाय समझौता कराने पर ज्यादा जोर देंगी तो फिर आप सोच लीजिए कि देश मे अदालतों के अस्तित्व पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। फिर क्या जरूरत है संविधान की? क्या जरूरत है अदालत की ? क्या जरूरत है गाउन पहनने वाले वकील की और जज की? फिर तो जनमत संग्रह कराइए और 52 फीसद लोग जो कह दे उसे ही न्याय मानकर फैसला सुना देना चाहिए।

जो बुद्धिजीवी वर्ग यह कहता है की विवादित स्थल पर कॉलेज अस्पताल या यूनिवर्सिटी बना दी जाए उनसे भी एक सवाल है कि कल अगर हाथों में कुदाल त्रिशूल और और विस्फोटक लिए हुए उन्मादियों की एक भीड़ उनके मकान पर यह कहते हुए धावा बोल दे कि इस मकान के नीचे किसी देवी देवता के अवशेष मिले हैं लिहाजा इस मकान के नीचे मंदिर है और इस कुतर्क के आधार पर आपका मकान जमींदोज कर दिया जाए तो फिर आप क्या करेंगे? क्या आप कहेंगे कि ? विवादित स्थल पर कॉलेज अस्पताल या यूनिवर्सिटी बना दी जाए विवाद को खत्म किया जाए शायद नहीं क्योंकि यह इंसाफ का तकाजा नहीं है। यह बातें हवा में नहीं कही जा रही हैं, बल्कि 4 साल पहले 2015 मे मुरादाबाद में जो घटना घटी थी उसी के मद्देनजर यह बातें कही गई हैं।

supreme court

दरअसल मुरादाबाद के हिंदू बहुल बस्ती में शहाना परवीन नाम की एक महिला ने अपनी जिंदगी भर की जमा पूंजी जोड़कर एक घर खरीदा। शाहना परवीन ने यह मकान एक ब्राह्मण परिवार से खरीदा था उनसे पहले यह मकान एक सिख समुदाय के परिवार के पास था। लेकिन इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं थी मगर जैसे ही है मकान सहाना परवीन ने खरीदा और उसमें रहना शुरू किया तो स्थानीय पार्षद पिंटू शर्मा को हिंदू बस्ती में मुस्लिम परिवार के रहने से आपत्ति होने लगी उस पार्षद ने साफ ऐलान कर दिया कि यह ब्राह्मणों का मोहल्ला है और इसमें किसी भी मुस्लिम को नहीं रहने दिया जाएगा विवाद बढ़ा लेकिन इस विवाद में पिंटू शर्मा लगभग असफल होते नजर आए तो उन्होंने फिर नई चाल चली और इस मकान को मंदिर की प्रॉपर्टी बता कर सील करा दिया वह परिवार जिसने अपनी तमाम जिंदगी की जमा पूंजी से इस मकान को खरीदा था फिर से किराए के मकान में आ गया, और उनके द्वारा मेहनत की कमाई से खरीदे हुए मकान पर प्रशासन ने ताला लगा दिया और फैसला सुना दिया कि अब फैसला अदालत करेगी सवाल यही से पैदा होता है क्या कर बातचीत से बाबरी मस्जिद विवाद का हल निकल जाता है तो क्या गारंटी है कि देशभर में जितनी भी मुस्लिम इमारते हैं उन्हें नुकसान नही पहुंचाया जाऐगा?

यह ऐसा सवाल है जिससे आंखें नहीं चुराई जा सकती क्योंकि जिस गिरोहों ने बाबरी मस्जिद को शहीद किया था उसी गिरोह का मानना है कि ताजमहल तेजोमहालय है और दिल्ली की जामा मस्जिद भी एक मंदिर है। उसी गिरोह का यह भी मानना है कि हर भारत जिसका निर्माण मुगल काल में हुआ वह कहीं ना कहीं एक मंदिर है अब सोचिए हिंदुस्तान में मुसलमानों की आबादी महल 25 करोड़ है और जिस गिरोह ने बाबरी मस्जिद को शहीद किया उसके मुताबिक उनके 33 करोड़ देवी देवता हैं, इस हिसाब से तो देशभर के 25 करोड़ मुसलमानों को बेघर करने का इस गिरोह के पास सबसे आसान रास्ता है। यह गिरोह कभी भी दावा कर सकता है कि 25 करोङ मुसलमानो के मकान 33 करोङ देवी देवताओ के मंदिरो के ऊपर बने हैं। क्या आप बाबरी मस्जिद शहीद करने वाले गिरोह के उस नारे को नजरअंदाज कर सकते हैं जिसमें उन्होंने बाबरी मस्जिद को शहीद करते हुए कहा था यह तो केवल झांकी है काशी मथुरा बाकी है?

पत्रकार वसीम अकरम त्यागी की कलम से…

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