pol

यूरोप की जो बात मुझे सबसे ज्यादा अच्छी लगती है वो ये कि उन्होंने अपने इतिहास से सबक लिया। एक जमाना था जब वहां सांप्रदायिकता और राजनीति का इतना ज्यादा मेल—मिलाप हो गया कि स्थिति विस्फोट हो गई। किताबों में जिक्र मिलता है कि उस दौर के कई कट्टर धर्मगुरुओं ने प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों को देश व धर्म का दुश्मन घोषित कर मरवा दिया।

उसके बाद वहां विभिन्न क्रांतियां हुईं, युद्ध हुए और भयंकर युद्ध हुए। आज जो हालत सीरिया, इराक और अफगानिस्तान की है, उससे भी ज्यादा बुरे दिन यूरोप ने देखे हैं। तब जाकर लोगों को समझ में आया कि धर्म का काम है इन्सान को इन्सान बनाना। जिसको जो धर्म मानना है, वह मानता रहे। यह उसका बेहद निजी मामला है। इस आधार पर न तो किसी को विशेष अधिकार मिलेंगे और न राज्य की ओर से परेशान किया जाएगा।

वहीं शासन चलाने के लिए कानून को सर्वोच्च माना गया। लोगों ने दिल के सिंहासन पर धर्मग्रंथ को बैठाया और सत्ता के सिंहासन पर कानून को। आज उन देशों की ओर देख तो लीजिए। इन्होंने आधुनिक विश्व को सबसे ज्यादा आविष्कार दिए हैं। सफाई और ईमानदारी में ये हमसे बहुत आगे हैं। अकेले यूरोप की दी हुई चीजों को ही दुनिया से निकाल दें तो हम एक दिन नहीं रह सकते।

इनके पास दुनिया के सबसे अच्छे विश्वविद्यालय हैं। मेडिकल, इंजीनियरिंग, कृषि, विज्ञान में इनके शोध का डंका दुनिया में बज रहा है। इन देशों से शायद ही कभी खबर आई हो कि कोई शख्स भूख या प्यास से मर गया। खासतौर से मैं ब्रिटेन का जिक्र करना चाहूंगा जिसे हम हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को कोसते हैं।

ऐसा नहीं है कि यहां रहने वाले सभी नास्तिक हैं। ब्रिटेन में ईसाई धर्मावलंबियों की अधिकता है लेकिन मुसलमान, हिंदू, यहूदी और बौद्ध भी खूब हैं।

ब्रिटेन के हर चुनाव में उन मुद्दों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है जिनका संबंध देशहित से है। वहां अर्थव्यवस्था, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, सुरक्षा को लेकर खूब बहस होती है। ब्रिटेन में पिछले सौ साल में एक भी चुनाव ऐसा नहीं हुआ जो पूजास्थल, जाति, आरक्षण, अंतरधार्मिक ​शादियों या किसी जानवर के मुद्दे पर लड़ा गया हो।

इसके ठीक उलट हमारे हर चुनाव में ये ही मुद्दे छाए रहते हैं। हमारे राजनेता बखूबी समझते हैं कि भारत की जनता भावुक है। इन्हें इन बातों में ही उलझाकर रख दो और पांच साल गुजार दो। जो मंदिर, मस्जिद और जाति के नाम से ही खुश हो जाएं, उन्हें विकास की क्या जरूरत है?

यही वजह है कि आजादी के 70 साल बाद भी हम गरीब, भूखे, बेरोजगार और लाचार हैं। हमने गलत प्राथमिकताएं चुन रखी हैं। 1947 में हमसे कमजोर हालत वाले देश भी बहुत आगे निकल चुके हैं और हम आज तक फालतू बातों पर लड़ रहे हैं।

आज हम सरकार से मांग करें कि भ्रष्टाचार पर जोरदार प्रहार करे, सख्त जनसंख्या नीति लागू करे, महिला सुरक्षा पर गंभीरता से काम करे, सेना को आधुनिक हथियारों से लैस करे, पुलिसकर्मियों को आम इन्सान से बात करने की तमीज सिखाए, रोजगार दे, सरकारी दफ्तरों में कामचोरी खत्म करे … ऐसे कई महत्वपूर्ण बिंदु हैं, लेकिन इन पर कभी चर्चा नहीं होती। और चर्चा करे भी क्यों, हम लोग भावुक जो ठहरे! जरा—जरा सी बात पर उत्तेजित होकर वोट दे देते हैं, फिर पांच साल तक उन्हें कोसते रहते हैं। फिर जोश—जोश में आकर वोट दे देते और दोबारा कोसते हैं। हमारी इसी आदत ने हमें दुनिया के सामने तमाशा बना दिया, वरना 130 करोड़ के मुल्क की ये हालत हो जाए!? कभी नहीं।

गौर से देखिए, हमारे भारत में हिंदुओं के नेता, मुसलमानों के नेता, दलितों के नेता, गुर्जरों के नेता, पटेलों के नेता, जाटों के नेता, ब्राह्मणों के नेता और भी न जाने कौन—कौनसे नेता भरे पड़े हैं, लेकिन देश का नेता मुश्किल से ही कहीं दिखाई दे।

अगली बार इन्हीं जाति, धर्म और बिरादरी वाले नेताओं को चुनकर 15 अगस्त को यह मत कहना कि ब्रिटिश राज की वजह से भारत पिछड़ गया। भारत के पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार हम हैं जो हिंदू, मुसलमान, ब्राह्मण, राजपूत, दलित, जाट बनने के लिए तो हर वक्त तैयार हैं, बस भारतीय बनना हमारे लिए मुश्किल है।

— राजीव शर्मा (कोलसिया) —

मुस्लिम परिवार शादीे करने के इच्छुक है तो अभी फोटो देखकर अपना जीवन साथी चुने (फ्री)- क्लिक करें

Loading...

विदेशों में धूम मचा रहा यह एंड्राइड गेम क्या आपने इनस्टॉल किया ?