आतंक का मज़हब ज़रूर पूछिए मगर आतंकवाद की मां का नाम भी बताइए

इराक़, सीरिया और ईरान…पिछले तीस साल के दौरान आर्थिक प्रतिबंध और युद्ध की मार के बावजूद ग़रीब देश नहीं हैं। इन तीनो देशो में प्रति व्यक्ति आय औसत भारतीय से क़रीब 540% ज़्यादा है लेकिन रोज़ाना सुबह ज़िन्दा उठने की उम्मीद 5400% कम। 1950 तक अफ़ग़ानिस्तान, फिलीस्तीन, यमन, सोमालिया, लीबिया, सूडान, लेबनान अगर अमीर देश नहीं थे तो ग़रीबी नहीं।

दुनिया की तीन प्राचीनतम सभ्यताएं, मिस्र, इराक़ और फारसी इस इलाक़े से ताल्लुक़ रखती थीं। लोकतंत्र का ब्रिटिश या अमेरिकन माॅडल भले न हो लेकिन लोगों का रहन सहन, जीवन पद्धति, शिक्षा और चिकित्सा का स्तर भारतीय उपमहाद्वीप से कहीं बेहतर था।

दूसरे विश्वयुद्ध में यहूदी जर्मनी से मार भगाए गए और युद्ध के बाद उनकी स्वदेश वापसी के बजाए ब्रिटेन ने इनको अरबों के सिर पर लाकर जबरन बसा दिया। आज लाखों फलीस्तीनी बेघर हैं। अपने घर मे मारे जाते हैं। न स्कूल हैं, न अस्पताल और न जीने का कोई साधन। कोई उनका मज़हब नहीं पूछता।

इराक़ मे सद्दाम की तानाशाही थी मगर हालात आज से हज़ार गुना बेहतर और लोगों की स्थिति लाख गुना अच्छी। मगर वहां लोकतंत्र लाने के नाम पर और रसायनिक हथियारों की झूठी कहानियां गढ़ कर अमेरिका और पश्चिम ने पाषाण युग मे पहुंचा दिया। सीरिया, मिस्र और लीबिया 2011 तक रहने के लिए बेहतरीन देश थे और आज बदतरीन देश हैं। दाउद शाह के ज़माने तक लोग काबुल में बसने के ख़्वाब देखा करते थे आज पूरे अफ़ग़ानिस्तान में मौत की भगदड़ मची हुई है। लेबनान, सूडान, ट्यूनिशिया, यमन, सोमालिया भी लोगों के जीवन को अशांत करने, घरों को क्लस्टर बम और मिसाइलो से तबाह करने की लंबी दास्तान हैं।

बहरहाल पिछले साठ साल में 55 लाख लोग मार दिए गए। सात करोड़ से ज़्यादा विस्थापित हुए और आज भी दो करोड़ से अधिक शरणार्थी जीवन जीने को मजबूर हैं। इन सब से कभी किसी ने उनका मज़हब नहीं पूछा और इन पर बरसने वाले बम और मिसाइलो का भी हमें आज तक मज़हब पता नही चला।

इन लोगों के पास न स्कूल हैं, न कालेज, न अस्पताल और न ही रोज़गार का कोई साधन। ये शानदार घरों के मलबे पर जन्म लेते हैं (यक़ीन मानिए 90% हिन्दुस्तानियों को ऐसे घर आज भी नसीब नहीं जैसे इन्होंने गंवा दिए), बम की आवाज़ से आंखे खोलते हैं, बंदूक़ के साए मे पलते हैं और एक दिन किसी गोली का शिकार होकर मर जाते हैं।

ख़ून ख़राबा कैसा भी हो जायज़ नहीं ठहराया जा सकता लेकिन जायज़ और नाजायज़ सभ्य लोगों के शब्द हैं। जिनकी सभ्यताएं ख़त्म हो गईं वो इन शब्दो को नहीं जानते। हो सकता है दस पांच ऐसे भी हों जो ऊपर वर्णित हालात से न गुज़रे हों लेकिन उनके बहकने में भी इन हालात का ख़ासा योगदान। मानसिक रूप से अपराधी के लिए तो दुनिया के किसी हिस्से की हिंसा का बहाना ही काफी है।

आतंक का मज़हब ज़रूर पूछिए मगर आतंकवाद की मां का नाम भी बताइए। अगर मतलब समझ नहीं आता तो थोड़ी देर के लिए आंखे बंद करके इनकी जगह ख़ुद को रखिए। समझिए अगर शांति से जीना है तो सिर्फ इनको मारते रहने से काम नहीं बनेगा। दुनिया को मिलकर वो वजहें भी ख़त्म करनी होंगी जो सभ्यता का क़त्ल करके वहां पाषाण युगीन मानसिकता को जन्म देती हैं। जब तक एक भी हाथ में बंदूक़ रहेगी चाहे वो हाथ आतंकी का हो या सैनिक का, ख़तरा सिर्फ मानव को ही होगा। दुनिया की हर बंदूक़ सिर्फ आदमी को मारने की नीयत से ही बनाई जाती है।

Saiyed Zaigham Murtaza
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