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माइनॉरिटी मतलब ‘द्वितीय श्रेणी नागरिक’ मतलब विक्टिम या डरा हुआ या फिर आप इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम पायदान पर खड़ा हुआ शख़्स भी मान सकते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अल्पसंख्यक हितों को लेकर चाहे कितना भी ख़ूबसूरत क़ानून क्यों न बना दिया जाए, लेकिन इस पूरी व्यवस्था में जिस क़ौम के आगे अल्पसंख्यक होने का ठप्पा लग गया वो अंततः द्वितीय श्रेणी का नागरिक बनकर रह जाता है।

मुसलमानों के साथ सबसे बड़ा फ़्रॉड ये हुआ कि इतनी बड़ी आबादी वाले इस समुदाय को अल्पसंख्यक बता दिया गया। जबकि ये इस देश का दूसरा सबसे बड़ा बहुसंख्यक आबादी वाला समाज है। इस देश में मुसलमान अल्पसंख्यक नहीं है। जिस समुदाय की भारत जैसे बहुसंस्कृति एवं विविधता से भरे हुए देश में पच्चीस करोड़ आबादी हो वो अल्पसंख्यक कैसे हो सकता है?

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इसे अल्पसंख्यक कहना एवं इसके लिए अल्पसंख्यक अधिकार की माँग करना ना सिर्फ़ बुज़दिली साबित हुई बल्कि इसके भविष्य के लिए नुक़सानदायक भी साबित हुआ। मेरे नज़दीक हिंदुस्तान में मुसलमानों की हैसियत अल्पसंख्यक की नहीं बल्कि दूसरी सबसे बड़ी बहुसंख्यक की है। और ये दूसरी बड़ी बहुसंख्यक हिंदुस्तान की क़िस्मत के तमाम सियासी और समाजी फ़ैसलों में बराबर की हिस्सेदार और हक़दार है। ये हिस्सेदार है चपरासी से लेकर प्रधानमंत्री तक के पद पर अपनी आबादी के अनुपात में बराबर की संख्या का।

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पर एक साज़िश के तहत इसे अल्पसंख्यक बनाकर इसके तमाम समाजी और सियासी हक़ छीन लिए गए और लॉलीपॉप पकड़ा कर इसे अल्पसंख्यक मामलों तक सिर्फ़ सीमित कर दिया गया। अल्पसंख्यक का दर्जा देकर चंद अलग स्कीमें तो बना दी गईं, पर इसके पीछे पूरी एक क़ौम को सेकंड क्लास नागरिक बनाकर बाक़ी के तमाम अधिकारों से वंचित भी कर दिया गया।

सियासी पसमांदगी का ये आलम हो गया कि देश की पूरी व्यवस्था में से इसकी हिस्सेदारी को इस तरह से ग़ायब कर दिया गया जैसे ये कभी थे ही नहीं। इस क़ौम की तमाम सोच और समझ को अल्पसंख्यक विभाग, अल्पसंख्यक मंत्रालय तक महदूद कर दिया गया। ज़हनी ग़ुलामी और ख़ौफ़ इतना भर दिया गया कि जिस सरज़मीन पर लगभग आठ सौ साल तक फ़ख़्र के साथ हुकूमत किए वहाँ आज डर डर के जीने पर मजबूर पर हैं। इस तरह से इनका ब्रेनवाश किया गया कि तुम संख्या में बहुत कम हो इसलिए चुपचाप ज़ुल्म और आतंक सहते रहो, अधिकारों की बात करने के बजाय अपने जान ओ माल की हिफ़ाज़त की विनती करते रहो।

एनजीओ छाप क्रांतिकारियों ने इसे विक्टिम बनाकर अपनी दुकान चमकाई, कोई इनका हितैषी बनकर ऐश काटा तो कोई इनके हक़ की लड़ाई लड़ने का ठेका लेकर खुद बड़का ठेकेदार बन गया। गरचे कि जिसने पाया उसने सिर्फ़ लूटा ही। चेहरे बदल बदल कर वही लोग बार बार आए और इस क़ौम को बर्बाद करते चले गए।

सोचने की बात है कि क्या पच्चीस करोड़ वाली आबादी वाला समुदाय इस मुल्क में अपने क़िस्मत के फ़ैसले ख़ुद नहीं कर सकता? क्या इतनी बड़ी आबादी को इस मुल्क में अपना भविष्य तय करने के लिए किसी सहारे की ज़रूरत है? इतनी बड़ी आबादी अपने आप को अल्पसंख्यक कहकर कबतक मुख्यधारा से दूर रहेगी?

अल्पसंख्यक दिवस पर प्रोफेसर मजीद मजाज के निजी विचार….

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