दीप पाठक

बर्मा में रोहिंग्या लोगों के रहने की जगह रखाईन इलाका देखा… नदी किनारे धान के खेत हैं साफ सुथरी मिट्टी से लिपी झोंपड़ियां…घर के पास आम कटहल केला नारियल सुपारी पान के पेड़ों का जंगल जैसा बंगाल के गांवों में होता है जमीन का प्रति मीलीमीटर हिस्सा उपयोग में लाते हैं छोटी जोत के भूमिधर, जब जमीन नपी तुली है तो घर बजार रास्ते सब संकरे होते हैं और छोटी-छोटी बात पर बड़े झगड़े हो जाते हैं !

यहां गांव कस्बे के भीतर ही आर्थिक चक्र चलाना होता है जीवन का मेहनत पर अधिक आश्रय होता है मुद्रा बाजार केवल अतिरिक्त सेवा उपार्जन भर हो पाता है !

ऐसे में दो पीढ़ी (चालीस बरस) की बसासत मानों तो ये खेतियां बंटी परिवारों की नयी ईकाइयां बढ़ीं कुटीर उद्योग वहां क्या होगा ये तो मुझे पता नहीं, पर जीवन की आवश्यक जरुरत का उपार्जन-बाजार भर होता होगा ! बड़े उद्योग तो वहां नहीं हैं इसलिए हाट बजार कस्बा बाजार और जंगल जल जैसे संसाधनों को लेकर झगड़े बढने लाजिमी हुए होंगे !

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अब शुरुआत जहां से भी हुई हो ऐसी सघन बसासत में जीवन को लेकर बहुत सख़्त जद्दोजहद रहती है और ऐसे में जब सांप्रदायिक जातीय चिंगारी सुलगती है कि “ये वाला समुदाय खतम हो जाय तो इनकी जमीन संसाधन पर हमारा हक हो तो जरा खुल के जियें ….तो सारी संतापी आबादी में हिंसा संक्रामक रोग की तरह फैल जाती है संसाधनों की घटती ने पहले ही समाज को कलही और हिंसक बना रखा होता है !”

पूरा पूरा एक ऐसा गांव अशांति के चलते जला दिया जाता है समूचे परिवार मारकर दफन कर दिये जाते हैं , वजह यही कि इस जगह पर हम लोग बसें जी सकें… हिंसा किस कदर जीवन का चरम है यह रख़ाईन की हिंसा देखकर समझ आता है !

इसमें भाग के आने वाले लोग भूमिहीन या छोटी सी जगह जमीन के मालिक हैं जिंदगी तो वहां के मौजूद संसाधन के हिसाब से वहां भी उनकी जिंदगी बस जो दिन कट जाये वाली हालत में थी !

हमारे इसी तराई में बंगाली लोगों की जोतें परिवार बढने से छोटी पड़ने लगीं हैं बिल्कुल वही रोहिंग्या लोगों जैसी बसावट,खेत की मेंड़ पतली होने लगीं हैं इंच इंच जमीन का उपयोग और झगड़े बढने लगे हैं, भाबर में कालोनियां प्लाट बेचकर नये मुहल्ले बने तो गांव के गांव का खेती का रकबा कम होता चला गया, और जो बची जमीन है वो खुदकाशत नहीं है बंटाई-ठेके पर यू पी से आये भूमिहीन खेतीहर मजूरों ने कमा ली है उनके परिवार भी यहां हैं और लगभग 40 हजार की अतिरिक्त आबादी यहां है इसके अलावा नदी चुगान मकान पुताई के काम में अतिरिक्त बिहार से आये मजदूरों की एक बड़ी तादात जो स्थानीय क्रेशर उद्योग से जुड़ी है !

यहां थोडा स्पेश है तब उसमें अस्थायी तौर पर अतिरिक्त अबादी समा पायी है ! कल यहां भी रोहिंग्या जैसे हालात बन सकते हैं अप्रवासियों को बाहर करने के नाम पर ऐसी क्षेत्रिय अशांति की फजां बन सकती है ! पहाड़ से रोजगार और बेहतर जीवन के लिए पलायन जारी है बड़े बांधों से विस्थापितों के लिए भी जगह बनानी है….. कल इस आबादी के लिए अतिरिक्त इन्फ्रास्ट्रक्चर न बना तो हालात बदतर होते चले जायेंगे !

लेखक परिचय – लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार है तथा घुमक्कड़ी में दिलचस्पी रखते है देश के कोने कोने से परिचित दीप पाठक जल,जंगल, ज़मीन से जुड़ीं समस्याएं उठाने में सवैद आगे रहते है

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