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प्रशांत टंडन

हम लोग अक्सर आरएसएस की औकात को ज्यादा कर के आंकते हैं. कुछ कहानियां गढ़ी जाती हैं इसके बारे में और हम विश्वास कर लेते हैं. हकीकत ये है कि ये बुझदिल लोग हैं और मुक़ाबला किया जाये तो भाग खड़े होते हैं.

5अप्रेल, 2011 में जब अन्ना हज़ारे दिल्ली के जंतर मंतर पहुंचे थे तब मैं एक अपने पत्रकार साथी के साथ सुबह ही वहां पहुंच गया था. मेरे साथी पत्रकार मुंबई से आये थे और मराठी थे. अन्ना के सामने सड़क पर कोई 30-40 लोग थे जो उनके साथ चल रहे थे. भीड़ न देख कर अन्ना हज़ारे बहुत गुस्से में थे और मराठी में रामदेव और श्री श्री रविशंकर को भद्दी भद्दी गालिया दे रहे थे (जिसका तर्जुमा मेरे मराठी दोस्त कर रहे थे). अन्ना कह रहे थे कि इन “….” ने ट्रको में भर कर लोग लाने का वादा किया था और अभी तक उनका एक भी आदमी यहाँ दिखाई नहीं दिया है.

फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि कुछ ही दिन के अंदर अन्ना हज़ारे हीरो बन गए, टीआरपी मिलने लगी, जंतर मंतर पर भीड़ उमड़ पड़ी, आंदोलन दूसरे शहरों तक पंहुच गया, सोशल मीडिया पट गया. भीड़ आयी तो उसे भुनाने किस्म किस्म के लोग भी आ गये.

किसकी ताकत थी अन्ना के पीछे उस वक्त – अरविंद केजरीवाल और उनके समर्थकों की? आरएसएस की? आरएसएस तो इस बार भी उन्हे लेकर आई थी फिर भी कुछ असर नहीं दिखा क्यों. इस वक्त भी समाज में उथल पुथल है, दलित, किसान, छात्र जैसे तमाम वर्ग आंदोलन की राह पर हैं. अभी कुछ ही दिन पहले हमने महाराष्ट्र में 50 हज़ार किसानों का ऐतिहासिक मार्च देखा है. साल के शुरू होते ही भीमा कोरेगांव की 200वीं बरसी पर लाखो लोग जमा हो गये. ये सब इस बार अन्ना के साथ क्यों नहीं जुड़े.

कुछ किताबे भी आई हैं उस दौर की लेकिन उस सामाजिक प्रक्रिया को रेखांकित नहीं किया जिसने अन्ना हज़ारे के आंदोलन को सफलता दी.

मेरा मानना है कि तमाम वजहों के साथ एक बड़ा कारण ये रहा कि उस वक़्त देश का बुद्धिजीवी तबका, प्रगतिशील और लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास करने वालों ने अन्ना के अनशन को आंदोलन में बदल दिया था. पिछले चार साल में मोदी की सरकार के दौरान हुये तमाम अन्यायपूर्ण कामो को भी यही तबका खुलकर चुनौती देता रहा है. कांग्रेस, वामपंथी पार्टियां और दूसरी सेक्यूलर पार्टियां सड़क पर उतर कर बीजेपी – आरएसएस से नहीं लड़ रहीं हैं – इनकी जंग आज भी सिर्फ ट्वीट या बयानबाजी तक ही सीमित है.

इस बार अन्ना हज़ारे अगर अपना बोरिया बिस्तर समेट कर कुछ ही दिन में बिना कुछ हासिल किए रवाना हो गये तो इसका भी बड़ा कारण यही है कि देश के प्रगतिशील तबके ने उनसे अपना हाथ खींच लिया.

आपके पास कलम है, समझदारी है और देश और समाज के प्रति नीयत साफ है – ये तीनों मिल कर एक बड़ी ताकत बनते है. इस पर घमंड नहीं कीजिये पर अपनी ताकत को पहचानिये ज़रूर.

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