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जम्मू के कठुआऔर यूपी के उन्नाव की घटनाओं ने एक बार फिर से मानवता को शर्मसार कर दिया है । दिल्ली में हुये निर्भया कांड के बाद महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे जहां खोखले नजर आते हैं वही बलात्कार के आरोपियों को सूक्ष्म समर्थन भारतीय समाज पर कलंक है।

आज से पहले समाज में कभी भी बलात्कारियों को समर्थन का मामला सामने नहीं आया लेकिन उक्त मामलों ने हमारी व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है । साथ ही रही सही कसर कठुआ के आसिफा कांड को धार्मिक चश्मे से देखने की प्रवृत्ति ने पूरी कर दी है ।

8 साल की मासूम लड़की के कातिलों को समाज के एक वर्ग से हमदर्दी मिल रही है जो भारतीय संस्कृति और सभ्यता के लिए शर्म की बात है। जिसके दूरगामी परिणाम ज्यादा खतरनाक होंगे । क्या इतने वीभत्स कांड को धार्मिक रूप देना उसको सही करार देगा ।

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आज सवाल व्यवस्था पर नहीं समाज पर खड़ा हो रहा है। कल तक गांव की बेटी को देश की बेटी कहने वाला समाज क्या इतना निष्ठुर हो गया है कि उसको बलात्कार के आरोपियों का समर्थन करने में जरा भी शर्म नहीं है। धिक्कार है ऐसी सोच पर ।लानत है ऐसे परिवेश पर जहां बेटियां बेटियां नहीं बल्कि हिंदू मुसलमान होती है ।

सरकार को ऐसे माहौल को बदलने के लिए कायदे-कानूनों में परिवर्तन लाना होगा वरना अपराध पर धर्म का चश्मा समाज को रसातल की ओर ले जाएगा जो राष्ट्र और समाज दोनों के लिए घातक है ।

अनीस शीराज़ी
स्वतंत्र लेखक

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