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मौलाना गुलाम मुस्तफ़ा नईमी

कोई भी लोकतांत्रिक देश उसी समय सफल होता हैं जब उसमें बसने वाले लोगों को उनके कानूनी व संवैधानिक अधिकार दिए जाए, उनकी धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा की जाए और उनकी धार्मिक सभ्यताओं में किसी प्रकार की बाधा से परहेज़ किया जाए ।

हमारा देश, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। लेकिन आज़ादी के बाद से ही यहां बसने वाले अल्पसंख्यकों विशेषकर मुस्लिम समुदाय के संवैधानिक व क़ानूनी अधिकारों के साथ सरकारें आंख-मिचौली खेलती आई हैं, लेकिन पिछले चार वर्षों में कट्टरपंथी संगठनों ने खुलकर देश के संवैधानिक अधिकारों में हस्तक्षेप का बीड़ा उठा रखा है, कहीं दबे तो कहीं खुले इन बदमाशों को सरकार और प्रशासन दोनों ने शह दे रक्खी है, जिसके कारण आज मुसलमानों की नमाज़ पर भी पाबंदी लगाई जा रही है..!!

संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन:

भारत का संविधान तीन मुख्य तत्वों पर आधारित है, जो निम्नलिखित हैं:

(1) सोशलिस्ट (Socialist) यानी, भारत एक समाजवादी देश होगा, किसी के लिए कुछ तखसीस (विशेष) नहीं होगा, संविधान के दृष्टिकोण में अमीर व गरीब सभी बराबर होंगे ।

(2) धर्मनिरपेक्ष (Secular) यानी देश का संविधान धर्मनिरपेक्ष (गैर-मज़हबी) होगा, यानी किसी खास धर्म का उस पर प्रभुत्व नहीं होगा।सरकार (कानून या प्रशासन) का अपना कोई धर्म नहीं होगा ।

(3) डेमोक्रेटिक (Democratic) यानी देश एक लोकतांत्रिक राज्य होगा, सभी निर्णय सार्वजनिक और लोकतांत्रिक होंगे, लोकतंत्र ही हर निर्णय के लिए मूल आधार होगा ।

भारत के संविधान की दफ़ा [25] और [28] के तहत मुसलमानों को अपने धर्म पर चलने, इबादत करने, धार्मिक रस्मो रिवाज और अपने धर्म के प्रचार व प्रकाशन की पूरी तरह से अनुमति हैैै और सरकार व प्रशासन को इस संवैधानिक अधिकार की सुरक्षा का ख्याल रखना चाहिए व संविधान का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़़ी कार्रवाई करना अनिवार्य है।

लेकिन यह कितना दुखद है कि जिस देश को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहा जाता हैं, आज उसी के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय को अपनी मज़हबी इबादत करने से खुलेआम रोका जा रहा है। इससे भी अधिक शर्मनाक यह है कि इस घिनौने काम में सरकार और प्रशासन भी शामिल है ।

नमाजों पर पाबंदी:

कानूनी तौर पर मुसलमानों को इबादत करने और इबादत स्थल (मस्जिद, मदरसा आदि) बनाने का पूरा संवैधानिक स्वतंत्रता प्राप्त है लेकिन यह केवल कागजों में है। तथ्य यह है कि आज मुसलमानों को इबादत स्थल बनाने से रोकने के लिए विभिन्न प्रकार के हथकंडे अपनाये जा रहे हैं ।

मस्जिद के निर्माण और नमाज़ों में रूकावट की ख़बरें पूरे देश से प्राप्त हो रही हैं लेकिन भाजपा शासित राज्यों में बदमाश अधिक निरंकुश (बे-लगाम) हो गए हैं, नमाज़ों का सबसे अधिक विरोध इस समय दिल्ली से कनेक्ट मेट्रो सिटी गुड़गांव (हरियाणा) में हो रहा हैं, यहाँ RSS समर्थित हिंसक संगठन टोलीयाँ बनाकर मुसलमानों को नमाज़ से रोक रहे हैं ।

गुड़गांव में खुली गुंडागर्दी:

गुड़गांव हरियाणा प्रांत का एक व्यवसायिक शहर हैं और साइबर सिटी के नाम से जाना जाता हैं, यह शहर राजधानी दिल्ली से बहुत करीब हैं, यही कारण है कि कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां, बीपीओ (BPO) और प्राइवेट सेेेेक्टर की सैकड़ों कंपनियां यहाँ चलती हैं, लेकिन पिछले कुछ महीनों से यह शहर कट्टरपंथी हिंदू संगठनों के हमलों के कारण सूर्खियों में रहा है

शहर में जनसंख्या के मुताबिक मस्जिदें न होने के कारण बहुत से लोग विभिन्न पार्क, खाली प्लाटों आदि में नमाज़ें अदा करते हैं।लेकिन अब यह हिंसक हिंदू संगठन इसके विरोध में उतर आए हैं की हम किसी भी कीमत पर नमाज़ें नहीं होने देंगे, इस लिए अब इन लोगों ने नमाज़ियों पर हमले शुरु कर दिए हैं ।

खुले में नमाज़ क्यों?

यहां एक सवाल यह है कि मुसलमान पार्कों, खाली प्लाटों में नमाज़ क्यों पढ़ते हैं? नमाज़ अदा करने के लिए मस्जिद क्यों नहीं जाते?  कट्टरपंथी संगठनों के लोग भी एक आम हिंदू को यही कहकर बरगलाते हैं, लेकिन मूल स्थिति पर नज़र डालें ताकि सच्चाई खुलकर सामने आ सके:

🔸वर्तमान समय में, गुड़गांव की जनसंख्या लगभ 15 लाख है, जिसमें मुस्लिम आबादी लगभग तीन लाख है ।

🔸शहर में काम के लिए बाहर से आने वाले मुस्लिम श्रमिक भी हैं, साथ ही साथ आस पास से आने वाले लोग भी हैं ।

🔸इतने बड़े शहर में मुसलमानों की सिर्फ 13 मस्जिदें हैं, जिनमें मुश्किल से 1500 मुसलमान ही नमाज़ें पढ़ सकते हैं ।

🔸औसतन 20 से 25 हज़ार की आबादी पर केवल एक मस्जिद हैं, जबकि सभी मस्जिदेंं मिलाकर भी 20 हज़ार लोग नमाज़ नहीं पढ़ पाते ।

🔸इसी शहर के 19 मस्जिदों पर शहर के विभिन्न लोगों ने अवैध रूप से क़ब्ज़ा जमा रखा है, और प्रशासन मौन धारण किए हुए है।

🔸नई मस्जिद बनाने पर प्रशासन ने प्रतिबंध लगा रखा है..!! (पत्रिका न्यूज़)

♢ इस सभी विवरणों के प्रकाश में यह बताया जाए की मुसलमान क्या करें ??
♢ उनकी मस्जिदों पर विभिन्न प्रकार के हीलो-बहानों से अवैध कब्ज़े कर लिए गए !!
♢ नई मस्जिद के निर्माण पर प्रशासन की तरफ से प्रतिबंध है !!
♢ तो अब मुसलमान अपनी इबादत कहां करें ??

इसलिए मुसलमान मजबूर होकर पार्कों में नमाज़ पढ़ते हैं, हालांकि एक आम मुसलमान भी यह अच्छी तरह से जानता हैं कि नमाज़ का असली आनंद और अधिक सवाब (पुण्य) मस्जिद में ही है, लेकिन इतने बड़े शहर में मुसलमान अपनी मस्जिदों में इबादत करने से भी वंचित हैं ।

नमाज़ीयों पर हिंसक हमले:

पिछले कुछ महीनों से गुड़गांव और करीबी क्षेत्रों में निरंतर नमाज़ पढ़ने को लेकर हंगामा खड़ा किया जा रहा हैं, लेकिन सरकार और प्रशासन की चुप्पी से उनके हौसले और मज़बूत हो रहे हैं, पिछले पांच महीनों में घटी कुछ प्रमुख घटनाओं पर नज़र ड़ालें:

🔹19 मई 2018 को भोरा कलाँ गांव में एक मज़ार पर रमज़ान का पहला जुमआ पढ़ने आए मुसलमानों को वहाँ मौजूद हिंदू संगठनों के 50 लोगों ने नमाज़ पढ़ने से रोका..!!

🔹2013 में इसी गांव में हिंदुओं ने एक साल तक मुसलमानों को नमाज़ नहीं पढ़ने दी ।

🔹2014 में यहाँ नमाज़ शुरू हुई, लेकिन यह शर्त लगाई कि बाहरी इमाम नहीं होगा ।

🔹नाथुपूर गांव में मुसलमानों ने नमाज़ के लिए एक जगह किराये पर प्राप्त की, लेकिन कट्टरवादी संगठनों ने घर के मालिक को धमकी दी और किरायेदारी को समाप्त करा दिया ।

🔹अगस्त 2018 मेंं गुडगाँव सेक्टर 34 में मोलश्री मेट्रो स्टेशन के पास नमाज़ पढ़ रहे लोगों को पुलिस ने ज़बरदस्ती हटा दिया ।

🔹28 अप्रैल 2018 को सेक्टर 53, सरस्वती कुंज में नमाज़ पढ़ी जारही थी, तभी वहाँ हिंदू संगठन के लोग पहुँचे और जय श्रीराम के नारे लगाते हुए नमाज़ को रोका ।

🔹शिवसेना गुड़गांव के अध्यक्ष गौतम सैनी का कहना हैं कि मुसलमानों के नमाज़ पढ़ने से लोग ड़रे हुए हैं! उनके इरादे ठीक नहीं हैं ।

🔹20 अप्रैल को पारस अस्पताल के सामने नमाज़ पढ़ी जारही थी, लगभग 200 नमाज़ी वहाँ मौजूद थे, करीब दर्जनभर युवाओं का एक समूह भड़काऊ नारेबाज़ी करते हुए पहुंचा और जय श्रीराम के नारे लगाते हुए सभी नमाजियों को वहाँ से हटा दिया, हालांकि मुसलमानों ने धैर्य से काम लिया वरना 200 के सामने दर्जनभर लोग कुछ भी नहीं थे।

🔹गुड़गांव के शीतला कॉलोनी में मदीना मस्जिद को हिंदुओं की जानिब से माईक चलाने की शिकायत पर सील कर दिया गया

शरारती तत्वों की इज्ज़त अफजाई

देश की आर्थिक हालात गंभीर हैं, बेरोज़गारी बढ़ रही हैं और युवा हर तरफ से निराश हैं, ऐसे माहोल में कट्टरपंथी संगठन मुस्लिम नफ़रत का ज़हर घोलते व झूठा वातावरण तैयार करते हैं, मुस्लिम आबादी का ड़र दिखाकर झूठा प्रोपगंडा किया जाता है। मुस्लिम नफ़रत के चलते युवाओं को बरगलाकर मुसलमानों पर हमले कराए जाते हैं और हमलों के बाद उन्हें “हिंदु रक्षक” का खिताब देकर सम्मानित व पुरस्कृत किया जाता है।

स्थानीय प्रशासन में उनके छोटे-मोटे काम कराकर यह धारणा बनाई जाती हैककि उनके इन्हीं कार्यों के कारण उनकी इज्जत व गरिमा और दबदबा है, जिसकी वजह से समाज में ऐसे बदमाशों को फलने फूलने का मौका मिल रहा है। हाल ही के एक विवाद में एक पार्क में नमाजियों पर हमला करने के कारण छह कट्टरपंथियों को जेल जाना पड़ा, लेकिन जब वह ज़मानत पर रिहा हुए तो हिंदू संगठनों ने उनका शानदार स्वागत किया व जुलूस निकाला ।

यही वो मीठा ज़हर है जिसकी चपेट में एक आम हिंदू युवा आ जाता है। बेरोज़गारी से चिंतित युवा को लगता हैं कि इस तरह के सांप्रदायिक कार्य से उसे समाज में इज्जत भी मिलेगी और प्रशासन में दबदबा मिलेगा यही कारण है कि युवा इस तरह के हिंसक कार्यों में ज़्यादा शामिल दिख रहे हैं ।

ऐसे जोखिम भरे माहौल में गंभीर और शांति की सोच रखने वाले हिंदु माता-पिता और शांतिपूर्ण हिंदू संगठनों को चाहिए की वह अपने युवाओं को इस तरह के सांप्रदायिक कार्यों से दूर रखें, इस तरह के कार्यों से उनका कैरियर कहीं न कहीं बरबाद और भविष्य अंधकारमय हो रहा है

गुड़गांव की आग दिल्ली तक:

वैसे तो गुड़गांव और दिल्ली के बीच सिर्फ 30 किलोमीटर का अंतर है, लेकिन दोनों शहरों की सीमाएँ अपने विस्तार के कारण एक दूसरे से मिल चुुुुकी हैं, इस लिए दिल्ली और गुड़गांव एक दूसरे का प्रभाव बहुत जल्दी स्वीकार कर लेते हैं, यही कारण है कि मस्जिदों पर प्रतिबंध की हवा अधिक तीव्रता के साथ गुड़गांव से दिल्ली तक पहुंची ।

मुस्लिम बहुल इलाके सीलमपुर के ब्रह्मपूरी की गली नंबर 8 में मुसलमानों ने नमाज़ पढ़ने के लिए ख्वाजा मासूम वेलफेयर ट्रस्ट के तहत एक जगह ख़रीद कर नमाज़ों का सिलसिला शुरू किया, बस इसी बात पर इस गली के रहनेवाले हिंदू परिवारों ने कुछ शरारती तत्वों के बहकाने पर एक बड़ा षड्यंत्र रच डाला।

नमाज़ रोकने के लिए षड्यंत्र (साज़िश):

नमाज़ और मस्जिद के निर्माण को रोकने के लिए इस गली के हिंदुओं ने शरारती तत्वों के बहकावे में आकर एक बड़ा षड्यंत्र रचा, जिसका सारांश इस प्रकार है:

❗ इस गली में कुल 60 घर हैं जिनमें 13 घर हिंदुओं के और बाकी 47 घर मुसलमानों के हैं ।

❗साज़िश के तहत हिंदुओं ने अपने घरों के बाहर “मकान बिकाऊ है” के बोर्ड लगाऐ।

❗इसके बाद कट्टरवादी चैनल “सुदर्शन टीवी” का प्रतिनिधि वहां पहुुंचा और सभी मकान वालों से पूछा, अचानक आप सब लोग एक साथ घर क्यों बेचना चाहते हैं?
जवाब में उन हिंदुओं ने कहा कि वह मुस्लिम पड़ोसियों से परेशान हैंं, वे यहाँ गली में आते जाते हैं, मोटर-साइकिल चलाते और शोर मचाते हैं ।

सुदर्शन चैनल के बाद राष्ट्रीय स्तर के मीडिया चैनलों ने इस ख़बर को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाया, “मुसलमानों के डर से घर छोड़ने पर मजबूर हुए हिंदू ” !!

जैसे ही नेशनल मीडिया में यह ख़बर आई तो हलचल मच गई, न्यूज़ चैनलों पर मुसलमानों की गुंडागर्दी और हिंदुओं पर उत्पीड़ना की ख़बरें गरदिश करने लगी, अंत में क्षेत्रीय विधायक और प्रशासन की उपस्थिति में दोनों पक्षों के बीच एक समझौता किया गया, जो समझौते के नाम पर मुसलमानों का अपमान व रुसवाई का दस्तावेज़ है।

समझौता या जिल्लत नामा:

हिंदु और मुस्लिम पक्षों के बीच जो समझौता हुआ वह एक तरफा और सरासर हिंदुओं की मर्ज़ी के अनुसार किया गया, मुस्लिम पक्ष की एक भी नहीं सुनी गई, बल्कि उन्हें ड़रा धमका कर उसी समझौते पर राज़ी होने के लिए मजबूर किया गया, अब ज़रा इस समझौते की शर्तें पढ़ें और मुस्लिम समाज की बेचारगी देखें।

🔸 समझौते के अनुसार मस्जिद के लिए खरीदी गई जगह को “मस्जिद” नहीं बनाया जा सकता।

🔸उस “घर” में सिर्फ 16 लोग ही नमाज़ पढ़ सकेंगे, और वह 16 लोग भी उसी गली के होंगे, कोई दूसरा मुसलमान यहाँ नमाज़ नहीं पढ़ सकता।

🔸उस “घर” को मदरसे में भी परिवर्तित नहीं किया जा सकता ।

🔸 उस “घर” में कोई नया निर्माण बिना हिंदू पक्ष के सहमति के नहीं किया जा सकता ।

🔸 नमाज़ पढ़नेवाले सभी लोगों का नाम, पता रिकार्ड पर रखा जाएगा ।

* इन शर्तों को पढ़कर आकलन लगायेककि समझौते में मुस्लिमों की कौनसी बातों को मनज़ूर किया ?

🔹 गली में तीन-चौथाई जनसंंख्या मुुुसलमानों की ।

🔹 मकान मुसलमानों का । लेकिन सिर्फ 13 हिंदु परिवारों ने मस्जिद बनाने से रोक दिया..!!!

🔹 क्या किसी हिंदु बहुल क्षेत्र में अल्पसंख्यक मुुुस्लिम क्या किसी मंदिर का निर्माण रोक सकते हैं ?

🔹 क्या प्रशासन इस तरह मुसलमानों की आपत्ति पर किसी मंदिर को बंद कर सकता है ?

🔹 क्या अब नमाजियों की संख्या का चुनाव भी हिंदू लोग करेंगे ?

🔹 क्या अब मस्जिदों में नमाज़ पढ़ने वाले लोगों का बायोडाटा भी जमा किया जाएगा ।

🔹 क्या इस तरह किसी मंदिर में पूजा करने वालों का रिकॉर्ड लिया जाता है?

इससे भी बड़ी शर्मनाक बात यह है की यह समझौता कराने वाले क्षेत्रीय विधायक खुद मुसलमान हैं
लेकिन बुरा हो ऐसी राजनीति का जिसके कारण कौम के सम्मान व दीनी ग़ैरत का सौदा करने वालों में अपने ही किसी भाई का नाम दिखाई देता है।

मस्जिदों के लाउडस्पीकर से दिक्कत है तो मंदिरों से क्यों नहीं:

आजकल मस्जिदों के खिलाफ़ लाउडस्पीकर को आसान हथियार बना लिया गया है, जिसे देखो मस्जिद के लाउडस्पीकर पर आपत्ति जताता हैककि इसके कारण हमारी नींद खराब होती है, लेकिन जिन लोगों की नींद मस्जिद की अज़ान से खराब हो जाती हैं वह लोग मंदिरों से बजने वाले लाउडस्पीकर पर क्यों चुप हैं !

🔹काँवड़ यात्रा के दिनों में कान फोडू डीजे. (DJ) के साथ निकलनेवाले काँवडियों के शोर पर कोई कुछ नहीं बोलता।

🔹हर दूसरे सप्ताह गली गली होनेवाले “माता की चौकी” से किसी की नींद में बाधा क्यों नहीं आती ?

🔹जगह जगह होनेवाले “माता के जग्राते” से क्या शोर नहीं होता ?

मस्जिद की अज़ान दो-तीन मिनट में पूरी हो जाती है, लेकिन मंदिरों, जग्रातों, काँवड़ और चौकीयों के लाउडस्पीकर रात रात भर चलते हैं, लेकिन क्या आज तक किसी भी मुस्लिम ने इसपर आपत्ति जताई ?

नहीं, क्योंकि मुसलमान किसी के धार्मिक मामले में हस्तक्षेप पसंद नहीं करते, लेकिन शरारती तत्व हमेशा मुसलमानों के मज़हबी मामले में हस्तक्षेप करते हैं और आजकल यह सिलसिला तेज़ी के साथ बढ़ता जारहा हैं ।

सरकार और प्रशासन से अपील

किसी भी देश की प्रगती व निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है कि वहाँ बसने वाले लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त हो, अन्यथा विकसित बनने का सपना कभी पूरा नहीं होगा।

हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, इसलिए इस देश को “शांति व इंसाफ़” का गहवारा भी बनायें, ताकि हर नागरिक देश के निर्माण और प्रगति में बढ़ चढ़ कर भाग ले सके।
संविधान में दिए कानूनी अधिकारों की रक्षा करना सरकार और प्रशासन की संवैधानिक ज़िम्मेदारी है, इसलिए देश को संवैधानिक नींव पर आगे बढ़ायें ।

किसी ख़ास धर्म को बेजा बढ़ावा देना और उस की बेजा हिमायत करना न्याय के खिलाफ है ।

मुसलमानों को भी चाहिए की वह अपने मामलों में सभी कानूनी कार्रवाई पूरी करने के बाद ही कोई ऐलान या घोषणा करें और अपने बीच की काली भेड़ों को कभी राज़ की बातें न दें क्योंकि यही वह लोग हैं जो अपनी दुनिया बनाने के लिए दीन व कौम दोनों का सौदा करते हैं ।

अपना सियासी लीडर भी किसी ग़ैरतमंद को ही चुनें, ताकी वह वक्त पढ़ने पर आपकी मजहबी ग़ैरत का खयाल रख सके, अन्यथा हर जगह इसी तरह की निराशा हाथ आएगी ।

(ये लेखक के निजी विचार है। उपरोक्त विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं।)

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