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जब दिल्ली के पटियाला कोर्ट में पत्रकारों की पिटाई की ख़बर आई तो मेरी मां ने हैरत और अफसोस जताते हुए कहा कि ये तो बहुत बुरा हुआ अब तो इस पर और बवाल होगा।

मैंने कहा- ना अम्मा, अभी देखना घंटे-दो घंटे में यह ख़बर नीचे उतार दी जाएगी।

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मां ने कहा क्या मतलब!

मैंने मां को समझाया दरअसल अभी ताज़ा-ताज़ा पत्रकार पिटे हैं, तो बेचारे इतना बोल रहे हैं। कोर्ट परिसर से सीधे इनपुट-आउटपुट में खबर पहुंची होगी, अपने पत्रकार पिटे हैं इसलिए तुरंत डेस्क ने ही फैसला ले लिया होगा कि इसे चलाओ।

अब थोड़ी देर में “संपादक कम प्रबंधक” और मालिक सक्रिय हो जाएंगे। कहेंगे अरे इससे तो ख़बर ही बदल जाएगी, एजेंडा ही पलट जाएगा। ये तो बीजेपी के खिलाफ चला जाएगा। “अपनी सरकार” को ही नुकसान हो जाएगा। रोको इसे, नीचे उतारो, पीछे करो। अपने संवाददाता को समझाओ, तूल न दें। कुछेक पिटे पत्रकारों का भी कुछ देर बाद हिन्दुत्व जाग जाएगा और वे भी सोचेंगे या उन्हें समझाया जाएगा कि अरे इसे तूल देने से देशभक्त बनाम देशद्रोह की पूरी बहस ही पटरी से उतर जाएगी। सारा मामला बिगड़ जाएगा। बहुत से पीड़ित पत्रकार ना चाहकर भी संपादक-मालिक के डर और नौकरी की मजबूरी में इस मामले में या तो चुप हो जाएंगे या कम बोलेंगे।

और वही हुआ। एक-दो चैनलों को छोड़कर जो “राष्ट्रवादी” होने की होड़ में नहीं हैं, उनके अलावा ज्यादातर सभी ने कुछ ही देर बाद इसे डाउन प्ले कर दिया। सॉफ्ट कर दिया। अब ख़बर वकीलों की गुंडई और उनके द्वारा छात्रों, शिक्षकों और पत्रकारों की पिटाई की नहीं थी, बल्कि हाथापाई और टकराव की थी।

हम सब जानते हैं कि हाथापाई तब मानी जाती है जब दोनों तरफ से हो, लेकिन यहां तो एक ही पक्ष पीट रहा था और दूसरा पक्ष पिट रहा था। कोर्ट के भीतर और परिसर में काले कोट पहने वकीलों ने पीटा और कोर्ट के बाहर बीजेपी विधायक ने एक सीपीआई कार्यकर्ता को पीट डाला और कह दिया कि पाकिस्तान जिन्दाबाद बोल रहा था। लेकिन उस कार्यकर्ता को भी रात तक किसी चैनल ने अपने स्टूडियो में बैठाना तो दूर उसका बयान तक नहीं दिखाया कि भइया उस समय क्या हुआ था, सच्चाई क्या है। तुम भाजपा मुर्दाबाद बोल रहे थे या भारत मुर्दाबाद। यह तक पता नहीं चला कि पिटाई के बाद जब पुलिस उस कार्यकर्ता को अपने साथ ले गई तो उसे छोड़ा भी या नहीं।

आप मेरी बात को इसी से तौल सकते हैं कि अपने पत्रकारों की पिटाई पर सभी चैनलों को जिस तरह आक्रामक होना चाहिए था, कोई नहीं हुआ।

ये तो छोड़िए पत्रकार संगठनों ने कल की घटना के विरोध में मार्च का ऐलान किया। लेकिन किसी चैनल में एक हेडलाइन तो छोड़िए खबर तक नहीं थी। यानी ये चैनल अपने उन पत्रकारों के साथ तक तो खड़े नहीं, जिनपर खुलेआम हमला हुआ, जिनके साथ राष्ट्रवाद के नाम पर मारपीट, छेड़छाड़ हुई तो ये औरों के साथ क्या खड़े होंगे।

इसलिए मेरी तो अपील है कि मारपीट के शिकार पत्रकार साथी और अन्य पत्रकार साथी, जो भी इसे ग़लत समझते हों इसके खिलाफ अपने-अपने संस्थान में भी आवाज़ उठाए। वरना चैनल तो चलता रहेगा, लेकिन जो थोड़ी-बहुत समझदारी और पत्रकारिता बची है वह भी ख़त्म हो जाएगी/ कर दी जाएगी।

 – मुकुल सरल, लेखक वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं।

साभार – हस्तक्षेप डॉट कॉम 

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