Friday, December 3, 2021

जरूर पढ़ें: ‘AMU विवाद और धर्मनिरपेक्ष राजनीति का दोगला चरित्र’

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फरवरी 2016 में जेएनयू को लेकर विवाद शुरू हुआ, वहाँ के छात्र नेता कन्हैया कुमार को देशद्रोह के केस में पुलिस ने गिरफ़्तार किया। तो उसके उपरांत पूरे देश में एक विरोध की लहर टूट पड़ी थी। नेता, पत्रकार, कवि, शिक्षक, मानवाधिकार कार्यकर्ता, लिबरल-सेक्युलर से लेकर सभी लोग जेएनयू के पक्ष में खड़े हुये जो कि बेहद ज़रूरी भी था। देश की एक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान पर हो रहे सत्ता द्वारा हमले का विरोध करना सभी अमनपसंद एवं लोकतांत्रिक व्यक्तियों का मूलकर्तव्य भी था।

जहाँ जेएनयू में एक तरफ़ सत्ता का आतंक जारी रहा तो उसका विरोध भी ज़ोरदार तरीक़े से हुआ, या यूँ कहें कि जितना होना चाहिए उससे अधिक भी हुआ। बड़े से बड़े निष्पक्ष पत्रकारों से लेकर सियासत की छोटी पगड़ी से लेकर बड़ी पगड़ी तक के लोग शामिल हुये। जेएनयू एक तरह से विपक्षीय दलों के आने जाने का अड्डा बन गया। किसी दिन सोलिडारिटी में राहुल गांधी जाते थे तो किसी दिन अरविंद केजरीवाल तो किसी दिन सीताराम येचुरी तो किसी दिन शरद यादव। या यूँ कहें दक्षिणपंथी ताक़तों को छोड़कर बाक़ी सभी विचारधारा के दलों के नेताओं ने वहाँ जाकर छात्रों एवं संस्था पर हो रहे हमले के ख़िलाफ़ विरोध किया। यही नहीं संसद में भी कई दिनों तक ये मामला चलता रहा।

अब बात करते हैं भारत को एक आज़ाद लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में खड़ा करने वाली एवं स्वाधीनता संग्राम की बुनियाद की ईंटों में शामिल संस्था एएमयू के बारे में। जहाँ लगातार कई वर्षों से दक्षिणपंथी संगठन हमले पे हमला कर रहे हैं। तरह तरह की बेबुनियाद एवं फ़र्ज़ी मुद्दों का सहारा लेकर इस प्रतिष्ठित संस्था को टारगेट करते रहे हैं। सरकारी भेदभाव तो छोड़िए, कई बार वहाँ के छात्रों के साथ बदसलूकी भी की गई। आज हद तो ये हो गई जब कैम्पस में घुस कर गुंडागर्दी एवं आतंक फैलाने की भी कोशिश किया गया। फिर इसके बाद जब वहाँ के छात्रों ने इसका विरोध किया तो उनपर उलटा लाठीचार्ज करके बुरी तरह से यातनाएँ दी गई जिसके कारण कई छात्र हॉस्पिटल में एडमिट हैं।

इतना ज़ुल्म एवं आतंक होने के बावजूद अभी तक कोई भी सियासतदान वहाँ नहीं पहुँचा और न ही किसी ने उन बच्चों के प्रति कोई संवेदना व्यक्त किया और स्टेट की अल्पसंख्यक विरोधी एवं फासीवादी नीतियों के ख़िलाफ़ कुछ बोला।
यहाँ मैं उन लोगों की बात कर रहा हूँ जो धर्मनिरपेक्षता के अंतिम ठेकेदार हैं और जो संविधान एवं मानवाधिकार की हर जगह बात करते हैं। एक संस्था को लगातार साज़िश के तहत बदनाम किया जा रहा है, वहाँ के छात्रों को पुलिस पीट रही है पर लखनऊ से लेकर दिल्ली तक के तमाम खद्दरधारी लोग चुप हैं।

आख़िर क्या वजह है कि मीडिया के कथित लिबरल चेहरे भी एएमयू के मुद्दे पर ख़ामोशी अख़्तियार कर लेते हैं। क्यों नहीं आजतक किसी ने एएमयू की स्वायत्तता के साथ हो रहे लगातार हमले पर ज़ुबान खोला?

इस मुल्क में पिछले सत्तर सालों से किसी यूनिवर्सिटी के साथ अन्याय हुआ है तो वो सिर्फ़ एएमयू ही है। कभी इसके नाम को लेकर माहौल बनाया गया तो कभी इसे आतंक का गढ़ बोला गया तो कभी इसके अल्पसंख्यक दर्जे को ख़त्म किया गया। ये भी इसके साथ हुआ है कि जब राजनीति के पास कोई मुद्दा नहीं रहा तो इसके नाम पर साम्प्रदायिक ध्रुविकरण का खेल भी इस देश में खेला गया जो आज भी जारी है। अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक विकास के लिए वजूद में आई इस संस्था ने अबतक सिर्फ़ नफ़रत झेला है। इसके लिए सेक्युलर दलों का रवैय्या सबसे अधिक ज़िम्मेदार है।

प्रोफ़ेसर मजीद मजाज की कलम से….

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