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मेहदी हसन एैनी
सीरिया में जब से बशार उल असद  हाथ में  सत्ता आयी है .. इस ने तातारियों की तरह  सुन्नियों का नरसंहार, उनकी आबादी को बरबाद करके,उन पर न्यूकलियर  हथियारों का इस्तेमाल करके अलिप्पो में सुन्नियों पर जीवन तंग कर दिया है, कई लाख लोग पलायन कर गए,’जो रह रहे हैं वे पेड़ों के पत्ते, कुत्ते बिल्ली खाने के लिए मजबूर हैं, इतिहासकार जब तारीख लिखेगा तो इसमें यह ज़रूर लिखेगा कि सीरिया की जनता पर बशार ने  वह अत्याचार किए जो आज तक किसी काफिर बादशाह  ने भी मुसलमानों पर नहीं किए लेकिन अफसोस इस बात पर है कि  मुसलमान देश मूकदर्शक बने हुये हैं, यह सब कुछ देख रहे हैं,।
लेकिन कोई इन मज़लूमों के साथ खड़ा होने वाला तो दूर उनके लिए आवाज उठाने वाला भी मौजूद नहीं है, सब ज़िंदा लाश बन चुके हैं.. शांति के ठेकेदारों की विश्व संस्था “संयुक्त राष्ट्र” जो कि वास्तव में लुटेरों की एक सभ्य  संगठन है, जिस का अस्ल उद्देश्य ही एकजुट होकर इस्लाम और दुनिया ए इस्लाम पर आक्रमण करना है. वह पहले दिन से इन सभी वैश्विक अपराध पर चुप रहता है,
जबकि इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि बशार ने वैश्विक कानूनों का उल्लंघन करते हुये सीरिया के बस्तियों पर एटमी हानिकारक गैस और बमों का इस्तिमाल किया है, जिसके परिणामस्वरूप नरसंहार हुआ परंतु इस पर संयुक्त राष्ट्र बिल्कुल शांत है और अत्याचार के खिलाफ शांति के लिए गठित पांच विश्व शक्तियों का संयुक्त मोर्चा “नाटो” जिसे अफगानिस्तान और इराक में तो और हत्या और विनाश का खेल खेलने हेतू  भेज दिया गया था, लेकिन  शाम में जारी नरसंहार, इंसानी तबाही और वैश्विक  नियमों की स्पष्ट उल्लंघन करने पर भी पृथ्वी की मसीहा यूनिट “नाटो” को बशार के खिलाफ क्यों नहीं उतारा गया?
क्योंकि सभी विश्व शक्तियों और पश्चिमी संयुक्त ताक़तों का एकमात्र उद्देश्य इस्लाम का सफाया है. जो कि अरब और खाड़ी देशों में अस्थिरता को बरकरार रख कर ही मुमकिन है। वर्तमान में कुछ दिनों से अलिप्पो पूरी तरह से जल रहा है.  वहां संगठित तरीके से नरसंहार किया जा रहा है. ईरानी शिया और रू़सियों के मदद से बशार इस बार हलब के मुसलमानों के ताबूत में आखिरी कील ठोंकने की कोशिश में है.
इतने खतरनाक परिस्थितियों में दिखावे के लिए बुलाई गई संयुक्त राष्ट्र की बैठक में सीरियाई दरिन्दा बिना किसी शर्म  के इस नरसंहार और क़त्ल ए आम को वैध और संवैधानिक बतला रहा है. कल संयुक्त राष्ट्र के समक्ष सारी बेहयाई के साथ शाम की अवैध सरकार के प्रतिनिधि ने कहा, हलब और दूसरे सीरियाई शहरों में सीरिया और उसकी सहयोगी बल जो कुछ भी कार्रवाई कर रही हैं, वह कानून और संविधान के अनुसार हैं, और जनता को आतंकियों से बचाने के लिए है, हक़ीकत ये है कि  बशार अल असद अपने ज़ालिम इत्तिहादियों के साथ मिलकर  सीरियाई नागरिकों का कत्ल ए आम कर रहा है और इस्लामी दुनिया किसी  चमत्कार के इंतिज़ार में है. विश्व समुदाय साहिल के दर्शक बने बैठे हैं.
अपने निवासियों और नागरिकों जानवरों से भी बदतर सुलूक करने की वजह से सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद न केवल देश की कयादत करने का नैतिक व मानव अधिकार खो चुके हैं बल्कि 90 प्रतिशत जनता का भी समर्थन गंवा चुके हैं. आईएस, नुसरा फ्रंट और अन्य आतंकवादी संगठनों पर हमले के नाम पर सीरियाई सरकारी सेना और रूसी सेना पिछले एक हफ़्ते  से शाम के ऐतिहासिक शहर हलब में जिस तरह बमबारी कर रही है उसके  नतीजे में हजारों बेगुनाह नागरिक मारे गए और सैकड़ों मफ़लूज हो चुके हैं.
रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी अधिकारियों ने दावा किया है कि रूस सीरिया के उन क्षेत्रों में भी हवाई हमले कर रहा है, जहां आईएसआई का वजूद भी नहीं है, शाम का सिविल वार अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अंग बन चुका है. दरअसल, दुनिया की दो बड़ी ताकतें अमेरिका और रूस, सीरिया के बहाने  एक अलग ही खेल रही हैं. अमेरिका और मग़रिब के कई देश, सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के विरोधी सिर्फ इसलिए हैं ताकि उन्हें सत्ता से बेदखल कर सीरिया को ग़नीमत  के रूप में आपस में बांट लें, अमेरिका और उसके चेलों को हमेशा से आतंकवाद को लेकर दोहरा रवैया रहा है.
वह कभी भी आतंकवाद का विरोधी नहीं रहा बल्कि उसने आतंकवाद को उन सरकारों के खिलाफ खड़ा किया जो उसके कंट्रोल में आने को तैयार नहीं थीं. इसी अमेरिका ने अलकायदा को रूस के खिलाफ लड़ने के लिए सशस्त्र किया था और आज फिर से वह आईएस की भी सहायता कर रहा है. वरना क्या कारण है कि सारी दुनिया मिलकर एक आतंकवादी समूह की ताकत खत्म करने में विफल है. क्या अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी,फ्रांस, सऊदी अरब और इसराइल से ज़्यादा ताक़तवर आईएस नामक आतंकवादी गिरोह है? सच यह है कि इस पूरे खेल के पीछे दोस्त नुमा दुश्मन अमेरिका है:
दूसरी ओर रूस आतंकवाद के खात्मे  के नाम पर बेगुनाहों पर हवाई हमला करके आलम ए अरब पर अपना  सिक्का जमाने की कोशिश कर रहा है, ऐसे हालात में जब कि शुमाली  शाम का शहर हलब बदस्तूर लड़ाई का मरकज़ बना हुआ है.  वहां से आने वाली खबरों के अनुसार इस शहर की शायद ही कोई इमारत  होजो तबाही से बची हो. इस शहर के बासियों के पास खाने पीने की चीजें भी कम पड़ती जा रही हैं. अस्पताल बंद हो चुके हैं, अंतिम डॉक्टर भी शहीद हो चुका है, पूरा शहर जल रहा है, आज वहां न रक्षा के लिए पुरुष बचें हैं,न विधवा होने के लिए महिलाओं, न ही अनाथ होने के लिए बच्चे, और न ही किसी का सहारा बनने के लिये नौजवान….
हद तो यह है कि  अमरीका और इसराईल जैसी शक्तियां सैन्य स्तर के अलावा अन्याय के नाम पर पहले “हिजबुल्लाह” और अब आईएस जैसी वैश्विक आतंकवादी इंसान दुश्मन संगठनों को उतार कर पूरी  दुनिया में शांति और सुरक्षा के खात्मे  के साथ साथ इस्लाम की साफ सुथरी छवि को दागदार और मुसलमानों को परेशान करना चाहते हैं, हिज़्बुल्ला और इस तरह की चरमपंथी संगठन जिन्हें इसराईल व ईरान सहायता भेजते हैं, और पूर्ण समर्थन करते हैं उनके द्वारा इराक शाम तथा लेबनान में सुन्नियों की खून की होली खेली जा रही है, और इन आतंकवादी संगठनों का खात्मा करने का नाम पर दूसरा विश्व महाशक्ति “रूस” एक लम्बे समय से “सीरिया” में निहत्तों  पर हवाई हमला करके बशार का साथ दे रहा है,
अमेरिका और रूस की दोगली नीतियों, बशार की पुशतैनी क्रूरता के कारण शाम बदस्तूर जल रहा है, उधर इराक नष्ट हो रहा है, ऐसे समय में शाह सलमान  ऊरदगान समेत सभी अरब देशों को अत्याचार के उस तूफान से टकराने के लिए खुल कर मैदान में आना चाहिए, सारी दुनिया के इंसाफ पसंद देशों को जोड़कर उन्हें साथ लेकर शाम पर एकजुट होकर हमला करके बशार के दमन से वहाँ के  निहत्तों को बचाना और उनको दोबारा आबाद कराने लिये कदम उठाना बहूत ज़रूरी है, इसी में इस्लामी देशों की भलाई है।
क्योंकि हलब में  माओं की इज्जत तार तार होती रहीं, हम मदहोश रहे बहनों के दुपट्टे जलाए जाते रहे हम बेखबर रहे, बच्चों की सिसकियाँ आकाश तक पहुंचती रही हमारे कान बहरे रहे, बूढ़े दर्द से कराहते रहे हम बेदर्द बने रहे, नौजवान आस लगाए रहे हम उदासीनता की चादर ताने रहे. लाखों इंसानी जानें गंवाकर, बच्चों और महिलाओं को विधवा और अनाथ कर, बेशुमार इंसानों को पंगु और लाचार करवाकर भी सीरिया मानवता के ठेकेदारों विशेषकर अरब देशों का ध्यान क्यों नहीं खींच पा रहा है ??
क्यों नहीं भारतीय मुसलमानों का प्रतिनिधि संगठन राजधानी की सड़कों से लेकर पूरे देश में संगठित विरोध करके पूरी दुनिया को बशार के अत्याचार के खिलाफ उठने का निमंत्रण नहीं देती? संयुक्त राष्ट्र को छोड़ दें, ओ, आई सी के नाम से बने इस्लामी देशों के संगठन पर तो दबाव बनाया जा सकता है.
अलिप्पो जल रहा है,शाम लट रहा है। इस्लामी जगत में चुप्पी छाई  है, दुनिया स्थिर हो चुकी हे. शांति के ठेकेदार बर्फ की तरह स्थिर हो चुके हैं, ज़रूरत है कि  उपमहाद्वीप के शांतिप्रिय लोगों और यहां के मुसलमान संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, रूस, के प्रोडक्टस  का बायकॉट करें. जब उनकी अर्थव्यवस्था गिरेगी, तो वह सीरिया  को छोड़ भागने की राह लेंगे, जब तक दोगली नीति वाले अमेरिका और रूस शाम को अपनी हालत पर नहीं छोड़ देते, यूं ही हमारे भाई और बहनें कटते रहेंगे और अरब देशों की सारी नीतियां नाकाम होती रहेंगीं…….
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