अनीस शीराज़ी: इल्म और तालीम को समर्पित थी आला हज़रत की जिंदगी

8:30 pm Published by:-Hindi News

– अनीस शीराज़ी

भारतीय उपमहाद्वीप में जब भी मुसलमानो के धार्मिक सुधारवादी आंदोलनों की चर्चा होगी तब उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में जन्म लेने वाले अदभुत प्रतिभा के धनी और बेमिसाल व्यक्तित्व आला हज़रत मौलाना अहमद रज़ा खां का ज़िक्र जरूर आयेगा। कुछ लोगो का व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली होता है कि कोई लाख चाहकर भी उसे नज़र अंदाज़ नही कर सकता है। ऐसे ही लोगो मे आला हज़रत भी शामिल हैं। जिनके व्यक्तित्व पर विरोधी विचारधारा के लोगो ने तमाम विरोधवास पैदा किए लेकिन लोगो को उनके पास तक पहुचने से नही रोक पाए। आला हज़रत बहुमुखी प्रतिभा के मालिक थे।

1856 में बरेली में जन्मे मौलाना की शिक्षा घर पर ही अपने पिता मौलाना नक़ी अली खां के दिशा निर्देशन में पूरी हुई। बहुत ही कम उम्र में धार्मिक शिक्षा पूरी कर लोगो में इस्लाम शिक्षा का प्रचार प्रसार करते रहे। कुछ ही समय मे उनकी विद्वता और धार्मिक मामलों में पकड़ की प्रसिद्धि पूरे उपमहाद्वीप में फेल गई। जिसे भी कोई मसला समझ ना आता बरेली को मौलाना के नाम से सीधी डाक भेज देता। मौलाना धार्मिक मामले में कभी रियायत नही करते जो भी मसला होता उसे सीधे पूछने वाले को बता देते। बड़े बड़े दिग्गज नेता, दानिश्वर, अदीब, समाजी कारकुन मौलाना से सवाल पूछते मौलाना बेधड़क शरीयत का हुक्म बता देते। अंग्रेज हुकूमत का दौर था कभी परवाह न कि सरकारी कारिंदे क्या कहेंगे। बल्कि मलका विक्टोरिया की तस्वीर वाले डाक टिकट को उल्टा लगा कर कहते कि लो अंग्रेज को उल्टा कर दिया।

शायरी में किसी से कोई तालीम हासिल न कि लेकिन बेमिसाल शायरी की वो सिर्फ पैग़म्बरे इस्लाम की तारीफ तक ही महदूद रखी। एक ही नात में अरबी, फ़ारसी, हिंदी, उर्दू भाषाओं का संगम सिर्फ आला हज़रत की ही देन है। पूरा नातिया दीवान हदाइके बख्शीश के नाम से भारतीय उपमहाद्वीप में मशहूर है। गली गली में उनके कलाम की गूंज सुनने को मिल जाती है। जहाँ जहाँ उर्दू लोग बोलते समझते हैं वहाँ वहां उनका लिखा सलाम ‘ मुस्तफा जाने रहमत पे लाखो सलाम ‘ और दुआ ‘ या इलाही हर जगह तेरी अता का साथ हो ‘ आपको मस्जिदों, मदरसों, दरगाहों और दीनी जलसों में सुनने को मिल जाएगा। लोगो को आम जुबान में कुरान का मतलब समझने के लिए उर्दू जुबान में कुरान पाक का अनुवाद किया। जो कंजुल ईमान के नाम से भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे ज्यादा प्रकाशित होने वाला उर्दू अनुवाद है। विभिन्न विषयों पर लगभग 1000 किताबें लिख कर वो मील का पत्थर कायम किया। जो आने वाली नस्लो को एक पैगाम दे रहा है ।

आपके द्वारा दिये गए अहम धार्मिक फतवो का संकलन फतावा ए रजविया के नाम से मशहूर है। जो लगभग तीस जिल्दों में तीस हजार पेज पर मौजूद है। जब आप दूसरी बार 1905 मे हज के लिए मक्का पहुँचे तो पैग़म्बरे इस्लाम के इल्म के ताल्लुक़ से 8 घंटे मे 250 पेज की किताब अद दोलतुल मकिया नामक किताब लिखी। जो उस समय के मक्का के गवर्नर के दरबार मे पढ़ कर सुनाई गई। जिसके बाद मक्का और मदीना के बड़े बड़े धार्मिक विद्वानों ने उनक़ी विद्वता की तारीफ की तथा आपको आलिमो का सरदार कहा। तसव्वुफ़ में आपने सैयद शाह आले रसूल मारहरवी से तालीम हासिल की।

शाह साहब ने आपको अपने सूफी सिलसिले आलिया कादरिया बरकातिया में मुरीद कर आपको अपना खलीफा भी मुकर्रर किया। मौलाना को उन विषयों पर भी महारत हासिल थी जिन पर शायद ही हिन्दो पाक के किसी धार्मिक विद्वान की कोई किताब मौजूद हो। अंतरिक्ष विज्ञान ,त्रिकोणमिति , रसायन विज्ञान, अर्थशास्त्र, खगोल शास्त्र, भूगोल आदि विषयों पर मौलाना की रिसर्च दंग कर देती है। उनकी किताब हक़कुल मुबीन जो उन्होंने जमीन, सूरज के चक्कर लगाने पर लिखी थी उस किताब को देख कर साइंस में नोबल प्राइज प्राप्त डॉक्टर अब्दुस सलाम ने कहा था कि मौलाना की इस किताब पर रिसर्च की जरूरत है।

उन्होंने अपनी तहरीरों के जरिये न्यूटन, आइंस्टीन और डार्विन के सिद्धांतों पर सवाल खड़े कर दिए, पानी का रंग और किस्म, मिट्टी की किस्मे, सूरज और जमीन की गर्दिश जैसे विषयों पर किताब लिख कर आपने अपनी विद्वता का लोहा विज्ञान जगत में भी मनवाया। उनके प्रशंषको में अल्लामा इक़बाल, मौलाना मुहम्मद अली जोहर, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सलमान नदवी, अली मियां नदवी,अ बुल उला मौदूदी, अनवर शाह कश्मीरी, नियाज़ फतेहपुरी, कौसर नियाज़ी आदि व्यक्तित्व शामिल रहे हैं।

मौलाना को उनके समय से ही धार्मिक संगठनों और बड़े धार्मिक विद्वानों ने मुजद्दीद कहना शरू कर दिया था। साथ ही धार्मिक विद्वान उन्हें आला हजरत, इमाम ए अहले सुन्नत, हस्सानुल हिन्द, शेखुल इस्लाम आदि उपाधियों से पुकारते हैं। आपने मुसलमानो से जुड़े हर मसले पर कलम उठाया। कभी अपने पराए का फर्क नही किया। मुसलमानो में फैली कुरीतियों को आपने खत्म करने की बड़ी पहल की। उपमहाद्वीप के मुसलमानो पर आपका अहसान है कि आपने लोगो को सूफिया की तालीम से जोडा।

वहाबी आंदोलन ने जब भारत मे सूफियों की तालीम पर उंगली उठाई तब आप दीवार की तरह उनके सामने खड़े हो गए। सेंकडो किताबे लिख कर उनका जवाब दिया। इस हकीकत को ख्वाजा हसन निज़ामी ने अपने एक रिसाले में दर्ज करते हुए आला हजरत को जमायते सूफिया का मुजद्दीद कहा। आला हजरत का व्यक्तित्व इतना आकर्षक है कि आपका विरोध करने वाले जब आपकीकिताबे पढ़ते हैं तो हैरान रह जाते है और प्रशसा पर मजबूर हो जाते हैं।

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