डॉ. शारिक़ अहमद ख़ान

बड़े वाले कुस्वा, फ़ारवर्ड कुस्वा अखिलेश यादव ने कल अपनी रैली में एक ऐसी बात कही जो ये तय करने के लिए काफ़ी है कि नेताजी मुलायम सिंह की सबको जोड़ो की नीति पर सपा अमल नहीं कर रही। कल अखिलेश ने कहा कि उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य बड़े वाले कुस्वा हैं, फ़ारवर्ड कुस्वा हैं, उन्होंने अपने अंदाज़ में छोटे कुस्वा लोगों से सपा को वोट देने की अपील दाग दी।  उनकी अपील से साफ़ था कि उनको बड़े कुस्वा नहीं बल्कि छोटे कुस्वा का वोट चाहिए।

बहरहाल, अब पहली बात ये कि कुस्वा नहीं कुशवाहा या कुशवाह कहा जाता है। कुशवाहा राजपूत भी होते हैं, लेकिन बड़े वाले कुशवाहा का मतलब पूर्वांचल में कुर्मी होता है और बैकवर्ड कुशवाहा का मतलब कोईरी, ये कोईरी वही जाति है जो सब्ज़ी उगाने का काम सदियों से परंपरागत रूप से करती आयी और सम्राट अशोक को अपना पूर्वज मानती है। परंपरागत रूप से कोईरी वोटर भाजपा के प्रति झुकाव रखता है, बीच में जब कोईरी समाज को बसपा ने जोड़ा तो काफ़ी संख्या में कोईरियों का झुकाव बसपा की तरफ़ हो गया था, अब कोईरी बैक टू पवेलियन है, मतलब वापस भाजपा की तरफ़ साफ़्ट कार्नर रखने लगा है। इससे ये तो तय मानिए कि कोईरी मतलब जिसको छोटा वाला कुस्वा अखिलेश ने कहा वो आज़मगढ़ में अखिलेश के खेमे में नहीं जा रहा।

अब बात आज़मगढ़ के फ़ारवर्ड कुशवाहा की जिसे कुर्मी कहते हैं और जिस जाति से यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य आते हैं। आज़मगढ़ लोकसभा की सगड़ी विधानसभा में कुर्मी जाति की जनसंख्या बहुत बड़ी है, कुर्मी आज़मगढ़ ज़िले की कुल जनसंख्या का लगभग सात से आठ परसेंट के बीच हैं। जिसमें से कुर्मियों की आधी जनसंख्या आज़मगढ़ लोकसभा की सगड़ी विधानसभा में है। पिछली बार सगड़ी विधानसभा से सपा के जो विधायक चुने गए थे वो कुर्मी ही थे और सगड़ी के कुर्मी सपा के बड़े वोटर रहे हैं। आज़मगढ़ की लालगंज लोकसभा के अतरौलिया में कुर्मियों के बावन गाँव हैं, जहाँ बौडरा रियासत के राजा बेनीमाधव सिंह नवाबी दौर में राज करते थे और 1857 की जंग में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़े थे, आज़मगढ़ शहर में मोहल्ला कुर्मीटोला है, शहर में भी कुर्मी बड़ी संख्या में हैं, कुर्मीटोला के ही आज़ादी से पहले से मशहूर पत्रकार राणा जंगबहादुर सिंह और उनके छोटे भाई पृथ्वीपाल सिंह थे। घोसी लोकसभा में मलान नाम का एक पूरा कुर्मी बेल्ट है जहाँ कुर्मियों के सैकड़ा भर गाँव आबाद हैं, नवाबी दौर में मलान में कुर्मियों की बड़ी ज़मींदारी रही। आज भी आज़मगढ़-लालगंज और घोसी लोकसभा में कुर्मी चुनाव जिताने और हराने की स्थिति में हैं। अखिलेश ने जिस तरह से फ़ारवर्ड कुशवाहा मतलब कुर्मी के बारे में बात की है।

अगर आज अटल बिहारी वाजपेयी जी होते तो इसी मुद्दे को अपने अंदाज़ में भुना ले जाते, अखिलेश की किस्मत है कि इस चुनाव में अटल जी से उनका साबका नहीं पड़ा। मोदी तो हैं लेकिन समझाने का उनका अंदाज़ जुदा है जो जनता के दिमाग़ में सीधे घर नहीं कर पाता, अटल जी कठिन बात को भी सीधे सरल अंदाज़ में कह जाते थे। फिर भी अखिलेश के फ़ारवर्ड कुस्वा वाले बयान से अगर कुर्मी नाराज़ हुए तो आज़मगढ़ लोकसभा की सगड़ी विधानसभा और नगर समेत छिटपुट इलाकों का सपा समर्थक कुर्मी वोटर खिसक जाएगा और कम से कम चालीस हज़ार पोल मतों का नुकसान कर देगा।

गठबंधन में शामिल होने की वजह से बसपा को लालगंज और घोसी लोकसभा में कुर्मियों की नाराज़गी झेलनी पड़ सकती है जो बसपा को बड़ी हानि पहुंचा सकती है, अखिलेश ने फ़ारवर्ड बनाम बैकवर्ड कुस्वा का बयान दे अपना तो नुकसान किया ही बल्कि बैठे-ठाले बहिन जी मायावती से भी कुर्मियों को नाराज़ करवा दिया। अब तो डैमेज हो चुका है, भरी रैली में हुआ है, छोटे नेताओं के बस का नहीं कि डैमेज कंट्रोल कर पाएं। अखिलेश को अभी नेताजी से राजनीति सीखनी चाहिए, नेताजी आज़मगढ़ से चुनाव लड़ रहे होते तो ये सब नहीं कहते, नेताजी रैलियों में कभी हल्की बात नहीं करते थे।

(ये लेखक के निजी विचार है)

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