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अजित अंजुम

1989 का एक चर्चित किस्सा है . ‘कौन बनेगा प्रधानमंत्री’ के खेल में शह और मात का किस्सा . वीपी सिंह और चन्द्रशेखर की टकराहटों के बीच मोर्चा सरकार के संभावित मुखिया के तौर पर देवीलाल का नाम उभरने और आखिरी वक्त पासा पलटकर वीपी सिंह की ताजपोशी का किस्सा . चंन्द्रशेखर के मंसूबों को मात देने के लिए एक ‘खेल’ रचा गया , जिसके किरदार खुद देवीलाल थे . कुलदीप नैयर थे . बीजू पटनायक थे . अरुण नेहरु थे और कुछ बड़े नेता . ये ऐसा खेल था जो सियासत बड़े खिलाड़ी और ‘अध्यक्ष जी’ के नाम से मशहूर चन्द्रशेखर को गच्चा देने के लिए खेला गया था . संसदीय दल के नेता की ताजपोशी के मंच पर चन्द्रशेखर के सामने सब कुछ मिनटों के भीतर ऐसे घटित हुआ कि वो आवाक रह गए कि अरे ये क्या हो गया ? चंन्द्रशेखर के प्लान को पलीता उनके ही मुख्य किरदार ने लगा दिया था .

हुआ यूं था कि 1989 के चुनाव नतीजे आ चुके थे . राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस बोफोर्स घोटाले के चुनावी मुद्दे के सामने पस्त होकर 197 सीटों पर सिमटकर रह गई थी . कांग्रेस संसद में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी जरुर थी लेकिन संख्या बल को समझते हुए राजीव गांधी ने विपक्ष में बैठने का ऐलान कर दिया था . दूसरे खेमे में विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ बीजेपी और वामदलों के समर्थन की ताकत ने राष्ट्रीय मोर्चा सरकार की बुनियाद रख दी थी .जनता दल सांसदों का बहुमत वीपी सिंह के साथ था क्योंकि राजीव गांधी विरोधी चुनाव के सबसे बड़े चेहरे वही थे . लेकिन एक शख्स किसी भी सूरत में उन्हें पीएम बनते नहीं देखना चाहता था . वो शख्स से चन्द्रशेखर . चन्द्रशेखर ने वीपी सिंह सिंह का रास्ता रोकने के लिए सारे घोड़े खोल दिए थे . चौधरी देवीलाल पर दांव चलकर वीपी सिंह के मुकाबले उन्हें खड़ा कर दिया था . दूसरी तरफ बीजू पटनायक से लेकर तमाम दिग्गज थे, जो किसी भी सूरत में वीपी सिंह को ही पीएम बनाने के पक्ष में थे , चाहे पार्टी टूट जाए . तनातनी की तलवारें अंत:खाने में भांजी जा रही थी . चन्द्रशेखर टस से मस नहीं हो रहे थे . तभी एक ‘गुप्त प्लान’ तैयार किया गया . ऐसा ‘गुप्त प्लान’ , जो आजाद भारत में अब तक पहली और आखिरी बार ही तैयार हुआ और कामयाब हुआ . इस ‘गुप्त प्लान’ का जिक्र कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा ‘एक जिंदगी काफी नहीं’ में किया है . तो आगे का हिस्सा उनकी ही किताब से .

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वरिष्ठ पत्रकार – अजित अंजुम

‘ पार्टी का शुभचिंतक होने के नाते मैंने वीपी सिंह और देवीलाल के बीच मुकाबले को टालने की जिम्मेदारी ले ली . मैं अरुण नेहरु से मिला , जो वीपी सिंह के निकट सहयोगी थे . वे भी सर्वसम्मति के पक्ष में थे लेकिन वीपी सिंह की कीमत पर नहीं . मैं देवीलाल को अच्छी तरह जानता था . मैं मुकाबले की सुबह उनसे मिला . वे अपने -आपको लेकर किसी भ्रम में नहीं थे . उन्होंने कहा कि वीपी सिंह बेहतर प्रधानमंत्री साबित होंगे लेकिन उनकी परेशानी यह थी कि वे चन्द्रशेखर को जुबान दे चुके थे कि वो मुकाबले में जरुर उतरेंगे . मैं जानता था कि वीपी सिंह का रास्ता रोकने की मुहिम चन्द्रशेखर ने ही शुरु की थी . खुद देवीलाल उन्हें प्रधानमंत्री के रुप में स्वीकार करने के लिए पूरी तरह से तैयार थे . चन्द्रशेखर उस किस्म के नेता थे जो अपनी बात न मनवा पाने की स्थिति में या तो पार्टी को तोड़ देते हैं या उसे छोड़ देते हैं . मुझे डर था कि नवगठित जनता दल में फूट कांग्रेस की वापसी का रास्ता खोल देगी . ऐसा लगता था कि राजनीतिज्ञों ने इमरजेंसी और उसके बाद जनता सरकार के पतन से कोई सबक नहीं सीखा था .

देवीलाल ने चन्द्रशेखर को उड़ीसा भवन बुलाया . वे मुझे भी अपने साथ लेते गए . वहां चन्द्रशेखर के अनुरोध पर बीजू पटनायक पहले से मौजूद थे . यह बिल्कुल साफ था कि अगर वीपी सिंह को प्रधानमंत्री के तौर पर स्वीकार नहीं किया गया तो पार्टी टूट जाएगी . चन्द्रशेखर ने कहा कि उन्होंने मधु दंडवते को देवीलाल का नाम प्रस्तावित करने को कहा था , जिसका वो अनुमोदन करेंगे . चन्द्रशेखर के कड़े तेवरों को देखते हुए मैंने देवीलाल से अनुरोध किया कि उन्हें चन्द्रशेखर का फॉर्मूला स्वीकार कर लेना चाहिए . देवीलाल ने ऐसा ही किया, हालांकि वो जानना चाहते थे कि मेरे मन में क्या है . मैने सिर्फ मुस्कुरा दिया .

हम दोनों कार में संसद भवन की ओर जा रहे थे तो मैंने उन्हें अपना फार्मूला समझाते हुए कहा कि उनका नाम प्रस्तावित और अनुमोदित होने के बाद उन्हें खड़े होकर खुद ही अपना नाम वापस ले लेना चाहिए और वीपी सिंह का नाम प्रस्तावित कर देना चाहिए . देवीलाल ने चौंककर मेरी तरफ देखा और मुक्कुराकर राजी हो गए . संसद भवन में पार्टी के सांसद नेता के चुनाव के लिए जमा हो चुके थे . देवीलाल चन्द्रशेखर को धोखे में रखते हुए हिचकिचा रहे थे . मैंने उनकी हिम्मत बंधाते हुए उन्हें महाभारत का एक प्रसंग सुनाया . युधिष्ठिर यह कहने के लिए राजी हो गए थे कि अश्वथामा , जो कि एक हाथी था , युद्ध में मारा गया . कौरवों की सेना में इसी नाम का एक योद्धा था , जिसने पांडवों के छक्के छुड़ा दिए थे . युधिष्ठिर ने झूठ नही बोला था लेकिन पांडवों ने उनके कथन को कौरवों में खलबली मचाने और उनका मनोबल तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया था . मैने देवीलाल से कहा कि उनके नाम के प्रस्ताव और अनुमोदन के बाद चन्द्रशेखर को दिया गया उनका वचन भी पूरा हो जाएगा , भले ही एक मिनट बाद वे किसी दूसरे का नाम प्रस्तावित कर दें . देवीलाल को मेरी बात समझ में आ गई . इस गुप्त फार्मूले की जानकारी मेरे और देवीलाल के अलावा सिर्फ पंजाब केसरी के संपादक अश्विनी कुमार को थी .

दंडवते ने देवीलाल का नाम प्रस्तावित किया और योजनानुसार चन्द्रशेखर ने इसका अनुमोदन कर दिया . देवीलाल मेरे साथ हुई बातचीत पर कायम रहते हुए अपनी सीट से उठ खड़े हुए . उन्होंने अपना नाम वापस लेकर और वीपी सिंह का नाम प्रस्तावित करके हर किसी को चौंका दिया . सब कुछ इतनी तेजी से और इतना अचानक हुआ कि कोई भी वीपी सिंह के नाम का अनुमोदन करके के लिए अपनी सीट से खड़ा नहीं हुआ . कुछ क्षणों के असमंजस के बाद जब सदस्यों को समझ में पूरी बात आई तो अजित सिंह ने उठकर वीपी सिंह के नाम का अनुमोदन कर दिया .

वीपी सिंह सर्वसम्मति से नेता चुन लिए गए . इस अवसर पर एक दिलचस्प बात यह हुई कि न्यूज एजेंसी यूएनआई का टिकर देवीलाल को पार्टी का नेता चुके जाने की घोषणा कर रहा था . इसका कारण यह था कि सबसे पहले खबर जारी करने की न्यूज एजेंसियों की होड़ को देखते हुए यूएनआई का रिपोर्टर देवीलाल का नाम प्रस्तावित और अनुमोदित होते ही टेलीफोन की तरफ दौड़ पड़ा था . नतीजा ये हुआ कि एजेंसी ने यही खबर जारी कर दी थी . देवीलाल ने अपनी सीट से उठने में कुछ समय लगाया था तो मेरा दिल धड़कने लगा था . लेकिन फिर वे उठे औऱ उन्होंने घोषणा की कि वे ‘ताऊ’ ही बने रहना चाहते थे .वीपी सिंह ने उन्हें उप-प्रधानमंत्री बनाकर उनके बड़प्पन का सम्मान किया .
मैं देवीलाल को बधाई देने उनके घर पहुंचा तो उनके परिवार के लोगों ने उन्हें घेर रखा था और उन्हें प्रधानमंत्री की बजाय उप प्रधानमंत्री का पद स्वीकर करने के लिए कोस रहे थे . देवीलाल उन्हें आश्वस्त करते हुए कह रहे थे कि उनके पद के आगे लगा ‘उप’ जल्दी ही गायब हो जाएगा . उनके बेटे ओमप्रकाश चौटाला जो बाद में हरियाणा के मुख्यमंत्री बने , मुझे कभी माफ नहीं कर पाए . वे हमेशा यही सोचते थे कि मैंने वीपी सिंह के साथ साजिश रचकर उनके पिता को प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया ‘

पुनश्च..

ऊपर का इतना हिस्सा कुलदीप नैयर की किताब से हूबहू है . इस कहानी में एक झोल है . कुलदीप नैयर ने लिखा है कि इस पूरे प्लान के बारे में उनके और देवीलाल के अलावा सिर्फ पंजाब केसरी के अश्विनी कुमार को पता था . उन्होंने ये भी लिखा कि देवीलाल का नाम चन्द्रशेखर की तरफ से अनुमोदित होने के बाद जब उन्होंने उठने में समय लगाया तो कुलदीप नैयर की धड़कन बढ़ने लगी कि कहीं प्लान फेल न हो जाए . मेरे मन में स्वाभाविक से सवाल हैं कि ऐसा कैसे मुमकिन है कि देवीलाल को समझा- बुझाकर इतने बड़े खेल की तैयारी की गई और जनता दल के दिग्गजों को पता ही नहीं चला या उनकी जानकारी के बगैर ये सब हो गया . अगर वहां देवीलाल अपने कदम वापस नहीं खींचते तो क्या होता ? चन्द्रशेखर के मंसूबों को मात देने के लिए बीजू पटनायक और वीपी खेमें ने क्या तैयारी की थी ? कुछ तो की होगी , वो कुलदीप नैयर के इस अनजाने प्लान के भरोसे तो नहीं बैठे होंगे ? सबसे आखिर में , कुलदीप नैयर पत्रकार होते हुए ये सब क्यों कर रहे थे ? ऐसी पैंतरेबाजी किसी पत्रकार को क्यों करनी चाहिए ? इस पर फिर कभी ..

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