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मेरे पास दो संदूक हैं जिनका मैं हमेशा बहुत खयाल रखता हूं। एक संदूक मेरी दादी मां श्रीमती राधा देवी के जमाने का है और दूसरा मेरे जमाने का। एक में किताबें हैं और दूसरे में कपड़े। दोनों संदूक मेरे पास तब से हैं जब मैंने गांव का गुरुकुल (मेरी लाइब्रेरी) की शुरुआत की थी।

किताबों वाला संदूक काफी भर चुका है और कपड़ों वाला लगभग खाली। इसकी अहम वजह यह है कि मेरी दिलचस्पी कपड़ों से ज्यादा किताबों में है। तीन साल पहले मैंने कोट खरीदने के लिए कुछ पैसे इकट्ठे किए थे। मेरी बड़ी इच्छा थी कि वैसा ही कोट खरीदूं जैसा कि मास्को वाले पहनते हैं। मैंने रूस में सर्दियों पर आधारित एक पेंटिंग देखी थी। तब से मैं वैसा ही कोट पहनना चाहता था।

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एक दिन मैंने रास्ते में देखा कि किसी गाड़ी के आसपास कुछ लोगों का जमघट लगा है। वहां पुरानी किताबें कम कीमत पर बेची जा रही थीं। मैं आदत से मजबूर वहां चला गया। उधर मेरा ज्यादातर समय फैसले बदलने में ही चला गया। क्या लूं और क्या न लूं! मैं खुद को उस भूखे बच्चे जैसा महसूस कर रहा था जिसे अचानक मिठाइयों की दुकान में छोड़ दिया गया।

वहां से मैं तीन किताबें लेकर आया। पहली किताब किसी रूसी लेखक ने लिखी थी। उसमें गणित की रोचक पहेलियां थीं। दूसरी स्वामी विवेकानंद की जीवनी थी और तीसरी किताब में कुरआन की कुछ आयतों का हिंदी अनुवाद था। मैं किताबें घर ले आया और कोट खरीदने का विचार रद्द कर दिया क्योंकि मैंने उसकी खास जरूरत नहीं समझी।

मुझे उस फैसले पर कभी अफसोस नहीं रहा। मुझे नए कपड़ों से ज्यादा लगाव भी नहीं है। मैं इसकी फिक्र क्यों करूं? आखिर लोग भी यह जरूरी नहीं समझते कि वे मेरे कपड़ों पर कोई टिप्पणी करें। शायद इसकी एक वजह यह है कि मैं लड़का हूं। इसलिए उन्होंने कभी मेरे कपड़ों पर टिप्पणी करना जरूरी नहीं समझा। मैं चाहे जैसे कपड़े पहनूं, कम से कम भारतीय समाज को तो इससे कोई खतरा नहीं है।

तो खतरा आखिर किससे है? क्या इस दुनिया को औरतों के कपड़ों से खतरा है? इस सवाल पर कई बड़े बुद्धिजीवी ऐसी बहस कर चुके हैं जो हमेशा बेनतीजा रही हैं। आप पूछना चाहेंगे कि मैं इस पर क्या कहूंगा। मैं इसके जवाब में कुरआन की दो आयतों का जिक्र करूंगा।

आयत इस प्रकार हैं –

  1. आस्थावान पुरुषों से कहो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें ….। (24 : 30)
  2. इससे अगली आयत में कहा गया है – आस्थावान महिलाओं से कहो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें। (24 : 31)

इन दोनों आयतों में एक बात पर खासतौर से जोर दिया गया है। वह है – मर्यादा। आचरण की मर्यादा। औरत हो या मर्द, दोनों के लिए कहा गया है कि अपनी मर्यादा में रहें। मर्यादा सिर्फ औरत के लिए नहीं, मर्द के लिए भी है।

दोनों आयतों में एक और महान सत्य छुपा है। मर्यादा और शालीनता का यह पाठ पहले मर्द को पढ़ाया गया है। उसे नसीहत दी गई है कि औरतों को उपदेश बाद में दे, पहले वह खुद अपनी निगाहें नीची रखे। पहले मर्द अपनी अपनी आंखों का पर्दा करे, उसके बाद औरतों को शालीनता का उपदेश दे।

सबसे पहले मर्द अपनी मर्यादा में रहना सीखें। औरतों के सुधार से पहले मर्दों को सुधारा जाए क्योंकि आज दुनिया को असल खतरा औरतों के कपड़ों से नहीं मर्दों की निगाहों से है।

अगर औरत को शर्म करने का पाठ पढ़ाया जाए तो यह जरूरी है कि मर्दों के लिए भी एक क्लास लगे और उन्हें शालीनता का, शर्म का सबक सिखाया जाए।

अगर मर्द अपनी निगाहें नीची रखना सीख जाएं तो औरतों के साथ होने वाली बदमाशियों की नौबत ही न आए। मर्दों के सुधार के बाद औरतों का सुधार होना चाहिए। कम से कम कुरआन तो यही कहता है क्योंकि इसमें औरतों के लिए मर्यादा की बात बाद में आती है, पहले मर्दों के लिए नसीहत दी गई।

बेशक औरतों का पहनावा शालीन होना चाहिए। अब अमरीका, ब्रिटेन में लोग क्या पहनते हैं, अफ्रीका के आदिवासी किस प्रकार नग्न घूमते हैं, उसे भूल जाइए। वहां का समाज और उसकी मान्यताएं भारत के समाज से बिल्कुल अलग हैं।

भारत में अगर कोई मां-बाप अपनी बेटी के पहनावे को लेकर टोकता है तो इसका यह मतलब नहीं है कि वे उसके दुश्मन हैं। वे उसे इसलिए टोकते हैं क्योंकि इस दुनिया में उसकी सबसे ज्यादा फिक्र करने वाले वे ही हैं। वे जमाने को बदलने की ताकत नहीं रखते, इसलिए बेटी के पहनावे को बदलना ज्यादा आसान समझते हैं।

यह कितना गलत या सही है, इसका फैसला आप करें लेकिन कितना अच्छा हो अगर शालीनता का यह पाठ बेटी से पहले हर बेटे को पढ़ाया जाए। हमें कभी नहीं सिखाया जाता कि मर्द होने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि आपको मनमानी करने का हक मिल गया। हमें कभी नहीं समझाया जाता कि मर्द होने से आपको बलात्कार का जन्मसिद्ध अधिकार नहीं मिल जाता। क्या ही अच्छा हो, अगर भारत का हर मर्द कुरआन की ये दो आयतें पढ़ ले। इन्हें पढ़ने के बाद मेरे दिल में औरतों के प्रति इज्जत और ज्यादा बढ़ गई है।

– राजीव शर्मा –

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