Saturday, May 15, 2021

अगर मदरसों की मान्यता ख़त्म तो शिशु मंदिरों की क्योँ नही ?

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सरस्वती शिशु मंदिर और मदरसों में बहुत बड़ा फर्क है जिसे कुछ लोग मिला देना चाहते हैं। वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं ताकि आरएसएस को खाद पानी हिंदुत्व के नाम पर मिलती रहे।

अभी मुझे एक घोर संघी आदमी ने मैसेज किया और सहानुभूति दिखाते हुए लिखता है,’भाई महाराष्ट्र की सरकार ने मदरसे के बच्चों को स्कूली छात्र मानने से मना कर दिया है। तो आपको भी लिखना चाहिए कि सरस्वती शिशु विद्या मंदिर के छात्र, स्कूली छात्र क्यों कहलाए जाएं।’

मैंने उसे जवाब दिया-
शुक्रिया, आप इस मामलें को लेकर अपना कंसर्न दिखा रहे हैं। अच्छा लगा। लेकिन मदरसा और सरस्वती शिशु मंदिर को एक सा क्यों बना रहे हैं? शिशु मंदिर तो आरएसएस द्वारा संचालित होते हैं और मदरसा तो कोई भी नाई? धोबी, शेख, पठान, कसाई, जुलाहा खोल कर बच्चों/बच्चियों को तालीम दे सकता है।


मदरसे इस्लामी तारीख, फिलॉसफी, गणित, अंग्रेजी, ऊर्दू पढ़ाते हैं। यहां से निकले बच्चे ऊर्दू, अरबी, फारसी विषय से लेकर दूसरे विषयों में रिसर्च भी करते हैं। मान्यता प्राप्त मदरसे के बच्चे ग्रेज्यूएशन के लिए राज्य और केंद्र की यूनीवर्सीटी में जाते हैं। लेकिन ज्यादातर हाफिज बन जाते हैं या फिर मौलवी क्योंकि मदरसों की तालीम का असल मकसद मज़हबी शिक्षा से है। मुसलमानों का सामाजिक ढांचा कुछ ऐसा है कि उनके यहां धार्मिक शिक्षा पर किसी खास जाति का हक़ नहीं है। कोई भी पढ़ सकता है और पढ़ा सकता है। कुल दो फीसदी मुसलमान इस्लामी तालीम के लिए मदरसों की तरफ जाते है। वो अपनी दुनिया नहीं बल्कि आखिरत के लिए ऐसा करते हैं। वो अल्लाह और कुरान के लिए ऐसा करते हैं।

लेकिन सरस्वती शिशु मंदिरों में देश का इतिहास, भूगोल से लेकर नैतिक शिक्षा तक भ्रामक तरीके से पढ़ाई जाती है। मुसलमानो के खिलाफ/ इसाईयों के विरुद्ध बच्चों को भड़काया जाता है। एक ऐसी नस्ल तैयार की जाती है जो अपने ही देश में रह रहे लोगों से नफरत करने को मजबूर हो जाती है।


आरएसएस के एजेंडा पर चल रहे ऐसे विद्यालय सनातन धर्म पर कब्जा ज़मा कर हिंदुओं में ब्राह्मणवादी सोच भर देना चाहते हैं। हिंदू धर्म वो नहीं जो संघ संचालित स्कूलों में पढ़ाया जाता है। वो तो वेद विद्यालयों में पाया जाता है। आश्रमों में मिलता है। संघ तो इसके उल्टे ज्ञान बांट रहा है। 


यदि कोई एक व्यक्ति मुझे यह साबित कर दे कि हिंदोस्तान के मदरसे इस मुल्क, इसके नागरिकों, इसके कानून, इसकी भोली भाषा और वर्गीय पहचान पर वैसी आपत्तिजनक शिक्षा प्रदान कर रहे हैं जैसी कि सरस्वती शिशु मंदिरों में दी जा रही है तो मैं इनबॉक्स में आने वाले संघी की हां में हां मिला लूंगा। फिलहाल तो नहीं। मुझे पता है मदरसे क्या सिखाते हैं। आपको नहीं पता तो कभी पास मौजूद किसी मदरसे चले जाइएगा या फिर उस संघी इनबाक्सिये द्वारा फेसबुक पोस्ट पर लोटने लगिएगा। महीन लाइन है। खूब खींची जा रही है। कुछ को ही दिखती है।

मोहम्मद अनस

पत्रकारिता के क्षेत्र ,में मोहम्मद अनस जाना पहचाना नाम है

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