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अबरार खान 

तनख्वाह लेने वाले सिपाहियों के सामने जब लड़ाई के मोर्चे नहीं होते सरहदें शांत होती हैं तो वह अपनी ही सत्ता के खिलाफ बग़ावत कर देते हैं । अपने ही बीवी बच्चों के खिलाफ हिंसक हो जाते हैं । अपने ही पड़ोसियों से लड़ने लगते हैं । क्योंकि लड़ना ही उनकी प्रवृत्ति है उन्हें लड़ना ही सिखाया जाता है उसके पीछे धर्म, राष्ट्रवाद, सत्य जैसे शब्द सिर्फ ख़ुदको जस्टीफाई करने के बहाने होते हैं ।

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कहने का तात्पर्य यह है कि जब आप शंभू रैगर जैसे तत्वों को पैदा करेंगे उन्हें बढ़ावा देंगे उनका सम्मान करेंगे उनका उत्साहवर्धन करेंगे सोशल मीडिया से लेकर के अन्य मंचों पर उनका महिमामंडन करेंगे तो समाज में अराजकता ही फैलेगी । क्योंकि जब शंभू रैगर को कोई अफराजुल नहीं मिलेगा तब वह अपने ही किसी भाई का गला घटेगा उसकी हत्या करेगा उसे जलाएगा । क्यों कि यह उसकी प्रवित्ति में है ।

किसी शायर ने क्या खूब कहा है कि “लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द में, यहां पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है । जब तक अतिवादी हिंसा का शिकार सिर्फ मुसलमान बनते रहे तब तक देश को कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं पड़ा, हालांकि फर्क अभी भी नहीं पड़ रहा है क्यों की हम धीरे-धीरे इन चीजों के आदी हो चुके । मगर अब भी नहीं चेते तो बहुत बड़ा फर्क पड़ेगा, देश की एकता अखंडता छिन्न भिन्न हो जाएगी क्योंकि जहां तक मैं देख पा रहा हूँ हम बड़ी तेजी से अराजकता को आत्मसात करते जा रहे हैं । किसी न किसी रूप में अराजकता को जस्टिफाई करने लगते हैं जिसका खामियाजा यह हो रहा है एक घटना की चर्चा हो रही होती है तभी दूसरी घटना घट जाती है और कभी-कभी तो एक ही दिन में कई घटनाएं घट जाती हैं फिर ऐसे में लिखने वाले सोचने वाले चिंतन करने वाले कन्फ्यूज़ जाते हैं कि उसघटना पर लिखें या इस घटना पर ।

इसी बढ़ती अराजकता का परिणाम है आज गुजरात में चुन चुन के बिहारियों के ऑफिस पर उनके कार्य स्थल पर उनके घरों पर हमले किए जा रहे हैं । उनके घरों में आग लगाई जा रही है उनके बर्तनों को उनके सामानों को तोड़ा-फोड़ा जा रहा है उन्हें पकड़कर पीटा जा रहा है । अप्रवासी बिहारी और यूपी के मजदूर तथा कारोबारी गुजरात छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं ।

2002 में जब गुजरात के बहुसंख्यकों ने मुसलमानों के साथ हिंसा की थी हजारों लोग मारे गए थे अरबों का नुकसान हुआ था उस वक्त अगर उन पर अंकुश लगा होता कुछ लोगों को सजा हुई होती तो शायद आज यह दिन देखने को ना मिलता । क्योंकि 14 माह या 14 साल की बच्ची से बलात्कार होना यकीनन बड़ी दुखद घटना है मगर यह घटना सिर्फ बहाना है क्योंकि ऐसी घटनाएं रोज ही समाज में घट रही है और बलात्कारी किसी भी धर्म का हो सकता है किसी भी जाति का हो सकता है किसी भी प्रांत का हो सकता है । क्या गुजराती बलात्कारी नहीं होते ? मैं मानता हूं कि गुजराती बलात्कारी होते हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि बिहार और यूपी के लोग भी बलात्कारी हो जाएं मगर यह कहाँ का इंसाफ है कि एक व्यक्ति के कुकृत्य की सजा पूरे प्रदेश के लोगों को या उसके पूरे धर्म या जाति के लोगों को दी जाए ?

यूपी तथा बिहार के लोगों के साथ यह सुलूक कोई पहली दफा नहीं हो रहा है।इसके पहले भी अन्य प्रांतों उनके साथ ऐसी घटनायें घटती रही हैं । शायद पहले हुई घटनाओं को गंभीरता से लिया गया होता या ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए कोई प्रावधान लाया गया होता कोई सख्त कानून बना होता तो आज जो कुछ गुजरात में हो रहा है वह नहीं होता ।

अब आप सोचिए यदि क्रिया की प्रतिक्रिया वाला शिद्धांत अपना लिया जाये तो देश का क्या हाल होगा ? सोचिए यदि मुंबई दिल्ली समेत अन्य प्रातों में रह रहे बिहारी यदि अपने पड़ोसी गुजरातियों पर हमला बोल दें तब क्या स्थिति होगी । सोचिए जैसे पिछले दिनों भाजपा के दबाव में नितीश कुमार ने आंध्रा प्रदेश से आने वाली मछलियों को बिहार में बैन कर दिया यदि उसी तरह यूपी और बिहार की सरकारें गुजरात के प्रोडक्ट्स का वहिष्कार कर दें या यही व्यवहा कोई अन्य प्रदेश दूसरे प्रदेशों के ख़िलाफ अपनाये तो देश की एकता अखंडता का क्या होगा … ?

दूसरी घटना बिहार के सुपौल जिले के एक स्कूल की है जहां गांव के ही मनचलों ने स्कूल की छोटी छोटी पचासों बच्चियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा उनके कपड़े फाड़े उनके बाल नोचे । अब सोचिए कि उन 10-12 साल की बच्चियों ने ऐसा कौन सा अपराध कर दिया होगा कि पूरा गांव उनके खिलाफ हो गया . मानता हूँ किसी 1-2 बच्ची ने कोई गुनाह कर दिया होगा मगर क्या पूरे स्कूल पर हमला करना, सारी की सारी बच्चियों के साथ मारपीट करना कहाँ तक जायज़ है । मगर जायज़ हो या नाजायज़ हो यह सब हो रहा है क्योंकि समाज का एक बड़ा तबका हिंसक हो चुका है निरंकुश हो चुका है उसकी प्रवृत्ति हिंसक हो चुकी है उसे हिंसा की लत लग चुकी है । जब उसे शिकार नहीं मिलेगा तो वह अपने ही बच्चों का शिकार करके खा लेगा । यह हिंसक समाज आदमखोर हो गया है उसे इस बात से फर्क नहीं पड़ता कौन गुनहगार है कौन बेगुनाह उसे इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता कौन प्रौढ़ है कौन युवा है कौन बच्चा है कोई महिला है कोई विकलांग है उसे बस मतलब है तो सिर्फ अपनी कुंठा अपना अक्रोश निकालने से ।

यह हिंसक प्रवृत्ति लोगों के मन में बसी उनकी कुंठा है जो दिनों दिन और मजबूत होती जा रही है । उसका कारण कि पिछले 4 सालों में देश में हद से ज्यादा बेरोजगारी है । उसका कारण है कि लोगों की समस्याओं से जुड़े जो मुद्दे हैं उन पर कोई बात नहीं कर रहा है, कोई उन लोगों की बात नहीं कर रहा है, कोई उनकी आवाज नहीं सुन रहा है, कोई उनका नेतृत्व नहीं कर रहा है । यही कारण है कि लोग अराजक होते जा रहे हैं कानून को अपने हाथ में लेने से हिचक नहीं रहे ।

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