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दीप पाठक

ये शायद भविष्य का भारत था इतना तो मुझे इलहाम था, मैं घर-बार विहीन फटे जूट के बोरे का लबादा पहने किसी शहर में भटक रहा था, मेरे हाथ में प्लास्टिक की पन्नी में कुछ बासी रोटियां थीं, गले में सुतली से बंधा आधार कार्ड था प्लास्टिक की बोतल में पानी था, रोटियों को मेंने छेद कर एक सुतली से बांधकर आधार कार्ड वाली सुतली से लिंक कर रखा था !

मुझे पता था कि अब भी खोने को मेरे पास बहुत कुछ था मेरी रोटियां कोई मुझसे छीन सकता था,जूट का लबादा उतार मुझे नंगा सड़क पर छोड़ सकता था, सो मैं ने सूखी रोटियां पानी से निगल लीं और टाट के पटके को कस लिया…

सड़कें सरपट थीं शहरों की गलियों में दंगे के बाद सुलगती आग का धुआं था पक्के और सुंदर मकानों के दरवाजे सख़्ती से बंद थे…

मुझे ये भी बताया था कि आवारा भिखमंगो को पकड़े जाने पर यातना देकर मारने का नया कानून आ गया था इसलिए मैं देह चुरा के, बदन छुपा के चल रहा था पर इतनी तैयारी नाकाफी थी शहर में बिजली गायब थी शायद इसलिए मैं किसी की नजर में आने से बचा रह गया था,

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मुझे चौकस रहना होगा अगर लाईट आ गयी या किसी की टार्च की रोशनी पड़ गयी तो मुसीबत हो जायेगी,ये एवरेडी के चार सेल वाला बड़ा टार्च तो बहुत दूर तक रौशनी फेंकता है.. मुझे अपना अतीत याद आया जब मेरे पास जींस की पेंट शर्ट जूते थे गर्म स्वेटर और जैकेट था, ये शायद कल की ही बात होगी पर इतनी जल्दी वक्त और हालात कैसे बदल गये ?
बहुत सोचने के बाद भी मुझे याद नहीं आ रहा था…

मैं शहर आया क्यों ? ये भी मुझे समझ नहीं आ रहा था, अरे हां याद आया ! गैरसैंण उत्तराखंड की स्थायी राजधानी बन गयी थी उसके बाद भी पलायन नहीं रुका, दूर के बैरी और नजदीक आ गये थे… पहले लखनऊ थे तो ठीक था, फिर देहरादून आ गये,अब गैरसैंण..वे उपर चढ़े तो उन्होंने वहां से लोगों को खदेड़ दिया था…

यहां शाय़द मैं लंगर की खोज में आया था मुझे पता था कि सरदार लोग रोज लंगर में भरपेट भोजन पंगत में बिठाकर खिलाते हैं,

मैं बस पहुंच ही गया था वहां लंगर में, वहां बड़े हंडो में दाल, लोहे की बड़ी कड़ाहियों में सब्जियां, और ये बड़े भगौनों में भात,और हजारों रोटियां बन रही थी..
“नाम जपो
कीर्त करो
बंड छको !”
मैं ये महामंत्र जपता हुआ उस ओर बढ़ा.. पर ये क्या ?

यहां तो बस खाली चटियल मैदान था और घने कोहरे पर किसी प्रोजेक्टर से रौशनी डालकर लंगर की फिल्म कोहरे पर दिखा कर खाने का भ्रम पैदा किया जा रहा था… वहां बहुत से मेरे जैसे और लोग कोहरे में दिखते आभासी खाने को नोच रहे थे पर हाथ में कोहरा भी नहीं आया…अरे ये तो सब हल्द्वानी नैनीताल अल्मोड़ा पिथौरागढ़ चमोली पौड़ी उत्तरकाशी रुद्रप्रयाग…के मेरे पहचाने परिचित लोग हैं, मैं उनसे छिपने की कोशिश कर रहा था और वे मुझसे।
इनकी हालत तो मुझसे बहुत अच्छी थी ये मेरी जैसी हालत में कब आ गये ?

तभी किसी ने मुझसे कहा- “अब कोहरा छंट जायेगा और धूप निकल आयेगी !”
मैं ने हताश होकर कहा-“तब हम दिखाई देंगे और सब पकड़े जायेंगे !” दिनेशपुर से आया एक बंगाली बोला-
“भूख के विरुद्ध भात के लिए
रात के विरुद्ध प्रात:के लिए !”
मैं बोला “चुप करो दादा भात के लिए नहीं रोटी के लिए बोलो, ठंड में भात खाने से कफ बढ जाता है !”
वो बोला- “किसानों ने बहुत सारा आलू सड़कों पर फैंका है,
वो तो मैं ने भी टीवी अखबारों में देखा था हम वहां से दूर थे और आलू सड़ गया था,

मुझे कफन के घीसू-माधव याद आये उनके पास कम से कम आग में भून के खाने के लिए साबुत आलू तो थे…

ये सपना यहीं समाप्त हुआ क्योंकि मुझे भूख लग आयी थी पेट कर्र-टर्र कर रहा था, नींद खुल गई मैं ने चाय और रोटी बनाने की तैयारी करनी थी !
अब सोना बेकार है मैं उठा और किचन में खटर पटर में लग गया !

लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार है तथा घुमक्कड़ी में दिलचस्पी रखते है देश के कोने कोने से परिचित दीप पाठक पहाड़ तथा पहाड़ी लोगो की समस्याएं उठाने में सवैद आगे रहते है

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