Tuesday, September 28, 2021

 

 

 

शहादत-ए-बाबरी: ‘6 दिसंबर का दिन हर एक हिंदू के लिए पश्चाताप का दिन’

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babrमेरे एक दोस्त हैं बाबूराम त्यागी रिश्ते में तो वे मेरे दादा लगते हैं लेकिन उनसे वो रिश्ता है जिससे दोस्ती कहा जाता है। 1992 में वे बीएसएफ में एस पी हुआ करते थे मेरा बचपन उन्हीं की बाहों में गुजरा है। 2001 में सेवानिवृत होने के बाद उन्होंने साहित्य और उसमें भी खासतौर से शायरी कविता को पढ़ना शुरु कर दिया। ऑन ड्यूटी वे मांसाहारी खाना भी खाते थे लेकिन अब वे शुद्ध शाकाहारी हैं, फिलहाल वे अपनी जन्मभूमी ग्राम रहदरा को छोड़कर मेरठ में बस गये हैं।

पिछली बार जब 6 दिसंबर आया था तो मैं उनके ही पास था, ये वो तारीख थी जब बाबरी विध्वसं के दो दशक बाद भी एक समुदाय के चेहरे पर उदासी थी, दिल में कहीं न उस मंजर की यादें ताजा हो रही थी, जब सूनी पड़ी सीता रसोई में इंसानों के खून के धब्बे जम गये थे। उस दौरान उन्होंने कहा था कि यह एक सच्चे हिंदू अर्थात जो सनातन धर्म की कद्र करता है उसके लिये शर्म का दिन है। ये उस इंसान की मुंह से निकला जुमला था जिसके नाम में राम आता है।

उन्होंने कहा कि 6 दिसंबर की वो घटना उन्हें आज भी इस तरह याद है जैसे बच्चों को गिनती और पहाड़े याद हो जाये करते हैं। जब आपसी भाईचारे को सांप्रदायिक लोगों ने जहर दे दिया था उस वक्त मेरे चेहरे पर जो उदासी छाई वह आज तक दूर नहीं हो पाई, पता नहीं क्यों ये सवाल मुझे परेशान कर रहा था कि मेरे घर पर कई मेरे मिलने वाले नमाज अदा करते हैं और मैं उनके वूजू के लिये पानी लाकर देता हूं बाकायदा मेरे घर पर जानमाज भी है। लेकिन क्या अब मेरा भी घर तोड़ा जायेगा ? वहां तो राम और रहमान की पूजा एक साथ एक छत के नीचे होती है क्या उस छत को भी तहस नहस किया जायेगा ? उस दिन 6 दिसंबर के बाद से मुस्लिम दोस्तों और मिलने आने वालों के प्रति उनका स्वभाव और ज्यादा नरम हो गया, इस्लाम की तारीफ, उनकी कल्चर, तहजीब का बखान हम ज्यादा करने लगे।

ये शायद बताने का प्रयास था कि ये मुल्क उन्ही का है। और जो दर्द उनको 6 दिसंबर ने दिया है, उसे शायद वो भूल जाये। बातें और बढ़ीं और बढ़त बढ़ते कैफी आजमी की नज्म पर आ गई मैने ये नज्म पहले कभी नहीं सुनी थी ये नज्म उनको मुंहजबानी याद है,

उन्होंने शायराना अंदाज में कहा –

राम बनवास से जब लौटकर घर में आये
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये
रक्से-दीवानगी आंगन में जो देखा होगा
छह दिसम्बर को श्रीराम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आये
धर्म क्या उनका है, क्या जात है ये जानता कौन
घर ना जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मेरा, लोग जो घर में आये
शाकाहारी हैं मेरे दोस्त, तुम्हारे ख़ंजर
तुमने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर
है मेरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आये
पांव सरयू में अभी राम ने धोये भी न थे
कि नज़र आये वहां ख़ून के गहरे धब्बे
पांव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे
राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे
राजधानी की फज़ा आई नहीं रास मुझे
छह दिसम्बर को मिला दूसरा बनवास मुझे

नज्म पूरी होती है और वे भर्राई हुई आवाज में कहते हैं कि ये उनकी एक कोशिश है अपने हर उस दोस्त से माफी मांगने के लिये जिसे मुसलमान कहा जाता है।  (अपने दादाजी बाबूराम त्यागी से बातचीत पर आधारित)

वसीम अकरम त्यागी
वसीम अकरम त्यागी

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