Monday, September 27, 2021

 

 

 

इस वुमेंस डे आई ब्रेस्ट टैक्स को खत्म करने के लिए संघर्ष करने वाली नांगेली की याद

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इस वुमेंस डे पर केरल पर 100 साल पुरानी एक वुमेन हीरो को याद किया जा रहा है। नांगेली नाम की इस हीरो ने ‘ब्रेस्ट टैक्स’ के बर्बर कानून के खिलाफ आवाज उठाई थी। इतना ही नहीं इन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इसके खिलाफ लड़ने में लगा दी थी। बता दें कि 100 साल पहले उस दौर में सार्वजनिक तौर पर अपने ब्रेस्ट को ढक कर रखने की इच्छा रखने वाली महिलाओं से टैक्स लिया जाता था।

नांगेली निचले माने जाने वाले तबके से आती थी। करीब 30 साल की नांगेली ने फैसला लिया कि वह त्रावणकोर के राजा लागए गए इस अमानवीय टैक्स को नहीं भरेंगी।   इस वुमेंस डे पर उन्हें याद करने वाले कन्नूर के एक कलाकार टी. मुरली ने बताया, ‘एक दिन जब स्थानीय कर अधिकारी (या परवथियार) बकाया ब्रेस्ट टैक्स वसूलने के लिए बार-बार नांगेली के घर आ रहा था तो उसने परवथियार को शांति से इंतजार करने के लिए कहा। नांगेली ने फिर केले का पत्ता सामने फर्श पर रखा, प्रार्थना की, दीप जलाया और फिर अपने दोनों स्तन काट डाले।’

बता दें कि चेरथला में नांगेली ने जिस जगह पर यह बलिदान दिया था, उसे मुलाचिपा राम्बु कहते हैं। मलयालम में इसका मतलब ‘महिला के स्तन की भूमि’ होता है। हालांकि स्थानीय लोग यह नाम लेने से हिचकिचाते हैं। आजकल ज्यादातर लोग इसे ‘मनोरमा कवला’ कहते हैं। कवला का मतलब जंक्शन होता है।   नांगेली के इस बलिदान के बाद ब्रेस्ट टैक्स का बर्बर कानून हटा लिया गया था। इस ऐतिहासिक घटना का जिक्र करते हुए मुरली कहते हैं, ‘चेरथला में हर कोई नांगेली की कहानी जानता है। नांगेली ने उस वक्त निचली जाति की महिलाओं के लगातार हो रहे उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने में अपना जीवन न्योछावर कर दिया था। उन्हें अपने स्तन ढकने के अधिकार के लिए टैक्स देना होता था। जितने बड़े स्तन होते थे, टैक्स की रकम उतनी ज्यादा होती थी।’

मुरली ने इस घटना की कहानी बताने के लिए कई तस्वीरें बनाई हैं। उन्होंने और कई दूसरे लोगों ने यह मांग भी की है कि सरकार को नांगेली के बलिदान को पहचान देनी चाहिए। उनका कहना है कि चेरथला में मुलचीपरम्बु के पास नांगेली का स्मारक बनाया जाना चाहिए।

पास के अम्बलापुजा के एक सरकारी कॉलेज में पढाने वाले असिस्टैंट प्रफेसर और स्थानीय निवासी थॉमस वी. पुलिकल कहते हैं, ‘नांगेली जैसी बहादुर महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की सच्ची कहानियां सुनकर हम सब बड़े हुए हैं।’ उन्होंने बताया कि नांगेली के वंशज अभी चेरथला के पास ही रहते हैं। हालांकि कई साल पहले वे लोग मुलचीपरम्बु छोड़कर चले गए थे।   नांगेली की झोपड़ी अभी भी वही पर है। उसके पास एक तालाब है जिसके एक किनारे पर दो बड़ी इमारतें बन गई हैं। (liveindiahindi)

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