रवीश कुमार

बिजनेस स्टैंडर्ड की पहली ख़बर कहती है कि रिज़र्व बैंक के नए नियमों और सख़्ती के कारण चौथी तिमाही में 37 बैंकों के एन पी ए में 1 लाख 40 हज़ार करोड़ की वृद्धि हो गई है। इसी के साथ सकल एन पी ए 9 लाख 80 हज़ार करोड़ हो गया है। यह राशि अभी और बढ़ सकती है क्योंकि जम्मू कश्मीर बैंक और ओवरसीज़ बैंक ने चौथी तिमाही के नतीजे घोषित नहीं किए हैं।

सभी बड़े बैंक कई सौ से लेकर कई हज़ार करोड़ के घाटे में चल रहे हैं। आज फाइनेंशियल एक्सप्रेस के संपादक सुनील जैन ने ट्विट किया है कि एक तरफ सरकारी बैंक डूब रहे हैं और बैंकर सैलरी वृद्धि की मांग कर रहे हैं। काश, सभी राजनीतिक दल मिलकर बैंकों से बेकार और अधिक कर्मचारियों की छुट्टी कर देते। क्या दस लाख करोड़ का एन पी ए बैंक कर्मचारियों की वजह से हो रहा है? ये सब नीतिगत फैसले होते हैं जहां सौ करोड़ या हज़ार करोड़ के लोन देने होते हैं। बैंकरों ने सीरीज़ के दौरान बताया कि उन्हें मुद्रा लोन देने के लिए मजबूर किया जा रहा है ताकि सरकार अपने आंकड़े दिखा सके। वे जान रहे हैं कि ये लोन नहीं चुका पाएगा फिर भी टारगेट आता है कि इतने लोन देने ही हैं। मुद्रा लोन भी तेज़ी से एनपीए में बदल रहा है।

इसकी सज़ा आम बैंकर क्यों भुगते? किस बड़े बैंक के सीईओ को बर्ख़ास्त किया गया है, क्या सुनील जैन से आर्थिक जानकार लिखेंगे कि सारे सीईओ को बर्खास्त कर देना चाहिए? आज से भारत भर के बैंकर दो दिनों की हड़ताल पर हैं। इनकी सैलरी पांच साल से नहीं बढ़ी है। इस दौरान इन्होंने तय समय से कई गुना ज्यादा काम किया है। बिना छुट्टियों के काम किया है। इसलिए सुनील जैन की यह बात सही नहीं है कि बैंकर निट्ठले हैं, बेकार हैं। बैंकरों की सैलरी वृद्धि का समर्थन किया जाना चाहिए। ग्रामीण डाक सेवकों को 5000 रुपये मिलते हैं, मोदी सरकार की बनाई कमेटी ने ही बढ़ाने का सुझाव दिया है मगर नहीं बढ़ाया जा रहा है। ग्रामीण डाक सेवक दो हफ्ते से हड़ताल पर हैं। पूरी डाक सेवा ठप्प पड़ी है, किसी को फर्क नहीं पड़ रहा है।

अगर सरकारी बैंक के कर्मचारी निठल्ले हैं तो फिर प्राइवेट बैंकों का घाटा क्यों बढ़ रहा है। टाइम्स आफ इंडिया का बिजनेस पेज देखिए। इस तिमाही में सरकारी बैंको ने 79,071 करोड़ का घाटा दिखाया है जबकि प्राइवेट बैंकों ने 42,000 करोड़ का घाटा। वहां तो लोग कम होंगे, काबिल होंगे फिर भी 42000 करोड़ का घाटा है। इसका मतलब है कारण बैंक में जितना नहीं है, उससे कहीं ज़्यादा बाहर अर्थव्यवस्था में है।

नोटबंदी के दौरान कहा गया कि अभी तकलीफ होगी मगर आने वाले समय में राहत होगी। दो साल हो गए मगर नोटबंदी के बाद आने वाली वो काल्पनिक राहत अभी तक नहीं आई है। आप जनता या पाठक ख़बरों को खोज कर पढ़ें तभी पता चलेगा कि कहां क्या हो रहा है। बिजनेस स्टैंडर्ड के 4 पर एक खबर है। लघु वित्त बैंक का एन पी ए भी 5-6 प्रतिशत बढ़ गया है। नोटबंदी के पहले यह एक प्रतिशत था। इस रिपोर्ट में धीरे से नोटबंदी और कर्ज़ माफी को कारण बताया गया है। बड़े बैंक हों या छोटे बैंक सबके सब डूब रहे हैं।

निर्यातकों की शीर्ष संस्था FIEO ने कहा है कि जीएसटी के तहत मिलने वाले रिफंड में देरी हो रही है। सरकार के पास उनका 20,000 करोड़ पड़ा हुआ है। इस कारण दिक्कतें बढ़ रही हैं। इनका कहना है कि 31 मार्च तक रिफंड ठीक गति से मिल रहा था लेकिन उसके बाद से ठहराव आ गया है। इसके बाद भी निर्यात सेक्टर ने अच्छा प्रदर्शन किया है। क्योंकि पेट्रोल के दाम बढ़े हैं और रुपये के दाम गिरे हैं। सरकार ने कहा कि जल्दी ही 20,000 करोड़ का भुगतान कर दिया जाएगा।

हिन्दी के अखबारों में आर्थिक ख़बरों की आलोचनात्मक पड़ताल कम ही होती है। जो प्रधानमंत्री बोल देते हैं या वित्त मंत्री बोल देते हैं, हु ब हू छप जाता है। चैनलों का भी वही हाल है।

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