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सन् 1939 की बात है। रचनात्मक कामों के बारे में चिंतन करते हुए एक दिन मैंने सोचा कि मैं भारत में रहता हूं। खुद को भारतीय कहलाता हूं तब हिंदू धर्म के ग्रंथों का जिस तरह मैंने अध्ययन किया है, वैसे एक हजार बरस से यहां रहने वाले मेरे पड़ोसी मुसलमान भाइयों के धर्म के ग्रंथों का भी मुझे अध्ययन करना चाहिए। वैसे पहले मैं कुरआन का अंग्रेजी अनुवाद पढ़ चुका था, लेकिन उससे संतुष्टि मिलती नहीं थी क्योंकि अरबी और अंग्रेजी की रचना व शब्द-जगत में बहुत फर्क है। इसलिए मूल अरबी कुरआन पढऩे की बात मैंने सोची।

मेरा स्वदेशी धर्म मुझे पवनार छोडऩे की इजाजत नहीं देता था इसलिए बैठे-बैठे जितना कर सकता था, उतना अध्ययन मैंने किया। दो-तीन साल तक कुरआन पढ़ा, आगे चलकर करीब 20 साल मैंने उसका अध्ययन किया। उसका बहुत सा हिस्सा मुझे कंठस्थ हुआ। कुरआन के शब्दों के सीधे मूल में जाने की कोशिश की। इस प्रयास में मुझे बहुत मानसिक संतुष्टि मिली। इससे मैं कुरआन का ‘हाफिज’ या आलिम हो पाया, ऐसा तो मैं कह नहीं सकता लेकिन गहरे अध्ययन का प्रयास जरूर किया। जितनी आस्था से मैंने हिंदू धर्म ग्रंथों का अध्ययन किया उतनी ही आस्था से कुरआन का भी किया।

सभी धर्मों में समानता है यह विश्वास तो पहले से था ही, क्योंकि मानव-हृदय एक है और धर्म का निर्माण करने वाले बड़े हृदय के होते हैं लेकिन इस अध्ययन से इस विश्वास का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। कुरआन के अध्ययन से मुझे यह दिखाई दिया कि इस्लाम उसी तरह का सहिष्णु धर्म है जिस तरह सभी धर्मों को होना चाहिए क्योंकि सत्य के प्रचार में जबरदस्ती, सख्ती की गुंजाइश नहीं होती है। यह स्वयं कुरआन ने ही कहा है।

कुरआन में एक और चीज मुझे मिल गई। दुनिया में दीन एक है। सत्य की राह पर चलना दीन यानी धर्म है। आगे कहा है कि तुम सब एक ही उम्मत, एक ही समाज हो। रीत-रिवाजों के अनुसार भेद पैदा हुए हैं, उनका कोई महत्व नहीं है। मैंने कुरआन शरीफ का अध्ययन ऊपर-ऊपर से नहीं किया है। मैंने उसमें जो गूढ़ता है, उसका अनुभव किया है। विज्ञान ने दुनिया को छोटी बना दिया है, और वह सभी मानव को करीब लाना चाहता है। ऐसे में मानव समाज विभिन्न जमातों में बंट कर रह गया है, और हर जमात अपने आपको ऊंची और दूसरों को नीची समझती है, तब क्या होगा? हमें एक-दूसरे को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए। एक-दूसरे के गुणों को अपनाना चाहिए।

पैगंबर (स.) ने यह शुरू में ही तय किया था ईश्वर यानी सत्य के आधार पर ही काम करना है। इसके लिए संसाधन रहेगा सब्र। सब्र यानी संयम, धैर्य, मुहम्मद (स.) के अनुयायी सभी आदेशों के अनुसार जिंदगी गुजारने की कोशिश करते। अलग-अलग उपासनाएं गलत होने की बात भी वे करते। इसलिए उन पर अत्याचार, जुल्म किए गए। तब अपने लोगों को साथ लेकर उन्हें मदीना जाना पड़ा। वहां भी तकलीफें शुरू हुईं। अनुयायी घबराने लगे। तब उन्होंने कहा, ‘‘घबराने की बजाय ईश्वर की राह में लडऩा बेहतर है।’’

इस तरह स्व-संरक्षण के लिए उन्होंने हथियार उठाया लेकिन यह भी समझाया, ‘‘लड़ते समय गुस्सा आने न दिया जाए। यदि गुस्सा आए तो हथियार मत चलाओ।’’

कुरआन का आदेश है कि पाप का मुकाबला पुण्य से किया जाए। बुराई को अच्छाई से खत्म किया जाए तो बेहतर लेकिन यह नहीं हुआ तब स्व-संरक्षण के लिए हथियार चलाना, वह भी क्रूरता छोड़कर ठीक है।

इस्लाम का प्रचार शुरूआत में त्याग, आत्मिक बल के कारणों से हुआ है। शुरू में खलीफाओं की धर्मनिष्ठा के कारण इस्लाम का प्रसार हुआ है। इस्लाम जहां-जहां पहुंचा वहां-वहां उन्होंने संदेश दिया ‘ईश्वर एक है’ कोई भी आदमी कितना भी बड़ा हो, लेकिन ईश्वर से उसकी बराबरी नहीं हो सकती। अपने बर्ताव में किसी भी तरह का भेदभाव न हो। सब बराबर-समान हैं इस्लाम शब्द के दो अर्थ हैं- एक है शांति, दूसरा है- ईश्वर की शरणता। जो ईश्वर की शरण में जाएगा, वह सत्कार्य करेगा, सदाचारणी होगा। भक्ति के साथ सदाचरण होगा ही।

ईश्वर का अद्वितीय एकत्व इस मौलिक कल्पना से मुहम्मद (स.) की प्रतिभा परिपूर्ण है। इस कल्पना का वर्णन करते हुए उनके वक्तृत्व में जो अनोखा जोश आ जाता है, उतना वह किसी और के वर्णन में नहीं आता।

इस्लाम यानी एकेश्वर-शरणता, यही संक्षेप में इस्लाम की परिभाषा की जा सकती है। इस्लाम ने जो कहा है वह मुझे बहुत ही महत्वपूर्ण लगता है। वह कहता है कि पैगंबर मुहम्मद (स.) एक मनुष्य है, ईश्वर नहीं है, ईश्वर एक है, अद्वितीय है। उसकी बराबरी कोई मनुष्य कर नहीं सकता।

‘‘ला इलाहा इल्लाल्लाहू, मुहम्मदुर रसूलुल्लाह’’
अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं और मुहम्मद (स.) उसका संदेश लाने वाले पैगम्बर हैं।

कुरआन में कहा है अल्लाह ने हर समूह में, अलग-अलग जगह पर अलग-अलग भाषा में बोलने वाले पैंगबर (प्रेषित) भेजे और हम पैगंबरों में कोई भेदभाव नहीं करते हैं।

‘‘ला नुर्फिरक बैना अहादिम मिर रुसुलिह’’ (कुरआन-2-285)

कुरआन शरीफ में दाऊद, नूह, मूसा, ईसा (अ.) आदि पैगंबरों के नाम दिए गए हैं तथा आखिर में कहा है-‘‘और भी बहुत से पैगंबर गुजरे हैं जिनके नाम भी तुम्हें मालूम नहीं हैं।’’

कुरआन में यह भी कहा गया है कि सभी पैगंबरों का समान, बराबर का महत्व है। हम उनमें फर्क नहीं करते हैं। ईश्वर के जो पैगंबर दुनिया में आए हैं, उनमें फलां, फलां से बड़ा इस तरह का फर्क हम नहीं करते हैं। कुरआन में एक जगह वह वाक्य है कि दुनिया में जितने सत्पुरुष गुजरे हैं,  उनका एक ही संप्रदाय है। उनमें फर्क नहीं है। सभी सत्पुरुष दिलों को एक करने के लिए बेताब थे। दिलों को जोडऩे का ही काम उन्होंने किया, और दुनिया में बराबरी, समानता रहे यही इच्छा उन्होंने की थी। पूरी मानवता को एक करने का उनका प्रयास था।

सभी पैंगबरों का एक सम्प्रदाय है- यह कुरआन ने कहा है इंसानों की एकता की दृष्टि से यह बड़ी बात है। यह हमारी समझ में आ जाए तो कितने ही झगड़े खत्म हो जाएंगे। फिर हम एक-दूसरों का अनुभव एक-दूसरों में बांट सकेंगे, जैसा कि आज विज्ञान में होता है।

इस्लाम ने कहा है, ‘‘ला इकराहा फिद्दीन’’ धर्म को लेकर कभी भी जबरदस्ती, सख्ती हो नहीं सकती है। कुरआन में कहा है-जो लोग (1) अल्लाह को मानते हैं (2) रहम करते हैं (3) एक-दूसरों की सत्य की राह पर चलने में मदद करते हैं। (4) एक-दूसरों को संयम, सब्र करने में मदद करते हैं केवल यही लोग सुरक्षित हैं। इसमें सभी धर्मों का सार निहित है: सत्य-प्रेम-करुणा।

तराजू हमेशा समान रहता है। कुरआन में तराजू को बड़ा महत्व दिया गया है। कहा है-जिस ईश्वर ने चांद-सूरज बनाए उसी ने तराजू भी बनाया है। सारी दुनिया का व्यापार-कारोबार तराजू की मदद से चलता है। तराजू यानी समानता। कोर्ट में इंसाफ होता है वह भी समानता के आधार पर। सूरज भेदभाव नहीं करता। पानी समानता बरतता है। वह गाय और बाघ में फर्क नहीं करता। यह समानता हमारे जीवन में भी आनी/होनी चाहिए।

कुरआन में सूद को अत्यंत बुरा बताया गया है जिसे हम सच्चा अर्थशास्त्र कहते हैं उसी के नजदीक जाने वाला यह विचार है। इस्लाम सभी को समान मानता है। उपनिषदादि ग्रंथों में हमारे यहां भी यह विचार दिखाई देता तो है, पर सामाजिक व्यवस्था में इसका अमल नहीं है। फकीरों ने गांव-गांव घूमकर इस्लाम धर्म का प्रचार किया है। उस समय यह चीज लोगों को बहुत आकर्षक लगती थी। बीच के काल में भारत में बहुत भक्त (संत) गुजरे और उन्होंने जातिभेद, साम्प्रदायिकता के खिलाफ मुहिम शुरू की और एक ही ईश्वर की उपासना पर जोर दिया। इसमें इस्लाम का हिस्सा बड़ा है। इस्लाम का भारत को यह बड़ा योगदान है। प्रस्तुति : सोमनाथ देशकर (संदेश लायब्रेरी, पुणे द्वारा प्रकाशित ‘संत, महात्मा, विचारक और इस्लाम’ से साभार)

(यह लेख मूल रूप से पंजाब केसरी डॉट कॉम पर प्रकाशित हुआ हैं, कोहराम न्यूज़ ने इस लेख को सह-साभार प्रकाशित किया हैं)


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