चुनावी चौसर पर लोकतंत्र की मर्यादा एक बार फिर दांव पर है. क्योंकि हार-जीत के दंभ और दमघोंटू राजनीति के बीच राजनीति की नैतिकता और सियासत की शुचिता दोनों पिस रहे हैं. यूपी में 17वीं विधानसभा के लिए चुनाव हो रहे हैं. और साथ ही चार अन्य राज्यों में भी चुनावी बिगुल बजाया गया है. ऐसे में जीत की लालसा और हार के ख़ौफ़ ने प्रचार अभियानों को हाईटेक विमान पर सवार कर दिया है.

भारत एकलौता ऐसा देश है. जिसके किसी न किसी हिस्से में लोकतंत्र का पर्व छोटे बड़े या मध्यम दर्जे पर हर छमाही ज़रूर मनाया जाता है. चुनने की आज़ादी और चुने जाने की छूट ने राजनीति के आसमान पर सत्ता के सूरज को ख़ूब चमकाया है. सत्ता के सूरज का ये महारथ कभी कांग्रेस ने हांका तो कभी समाजवादियों की मौक़ापरस्त गुट वाले गठबंधन ने. कभी ज़ाफ़रानी सुरमा आखों में लगाकर संघ के खेमे ने इसे नैतिकता के मैले आंचल से ढंकने की कोशिश की. तो कभी एनडीए और यूपी की शक्ल बदलकर सियासी सूरमाओं ने इस महापर्व का महागान किया. इन सब ने अपनी क़ुव्वत और अपनी क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल करते हुए सत्ता का रसपान करने की हर उस उत्कंठा का घटाटोप प्रदर्शन किया. जिसका वक्त पड़ने पर ज़रा भी फ़ायदा उठाया जा सकता था. भले ही इसके लिए नैतिकता के घट और कूप में छलांग क्यों न लगानी पड़ी हो. सत्ता का दोहन करने के लिए आदर्शों की तिलांजलि और परिपाटियों की अनदेखी साल दर साल मिज़ाज और मौक़े के मुताबिक होता रहा. सत्ता पाने के लिए जनता को एक दिन का ही सही जनार्दन बनाना तो नेताओं की मजबूरी है और पहले भी थी. लिहाज़ा उनतक पहुंच बनाए बिना भला कैसे रहा जा सकता है.

चुनावी मौसम में अपनी बातें कहने के लिए अपना राग गढ़ा गया तो अपनी डफली भी खूब बजायी गई. गली-मोहल्ले चप्पे चप्पे राजनेताओं का पद परवर्तन स दौर की मजबूरी थी. दीवारों पर पोस्टर और ऊंचाई पर झंडे लगाना जीत की निशानी बनने लगी थी. वो 50 के दशक का भारत था. जिसकी जनता भोली थी. लेकिन आज ज़माना अलग है. जनता को जनार्दन कहना आज भी मजबूरी है. लेकिन साधनों से लैस नेता खुद को चुनावी मोर्चे पर हाईटेक आर्मी के ट्रेंड कमांडर से कम नहीं समझते हैं. क्योंकि आज हर वो साधन मुहैय्या है. जो मौक़े को साधता है. मिज़ाज को भाता है. और समय का सदुपयोग करता है. आज का ज़माना सर्वे का है. जो चुटकियों में हो जाता है. मतदाता के मन की बातें सीधे उगलवाना बेशर्मी के साथ ही सटीकता पर संशय समझा जाता है. लिहाज़ा हाईटेक सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है. जनता का मूड समझने के लिए कई तरह के सियासी और समाजी स्टंट किये जाते हैं. फिर उसका असर सर्वे की रपटों में देखा जाता है. और फिर प्रचार के सारे हथियारों से चौतरफ़ा हमला किया जाता है. जिसका मक़सद होता है, मतदाता को भ्रमित करना. उसकी मनोदशा को हाईजैक करके अपनी बातें दिल में बिठाना. ये बातें भी ऐसी. जो कानों के रास्ते सीधे दिमाग़ पर असर करती हैं. और दिल पर क़ब्ज़ा जमाती हैं. ताकि मतदाता खुद अपनी अक्ल चाहकर भी न लगा सके. और अगर इक्का दुक्का मतदाता लगा भी ले. तो मकसद हमारा ही सधे. इसके लिए अब सोशल मीडिया का जीतोड़ इस्तेमाल हो रहा है. वॉट्सअप पर प्रचार का हर नयापन सुबह सवेरे दस्तक दे रहा है. फ़ेसबुक पर अपनी पहचान और दलों की छाप छोड़ने के हर संदेश तूफ़ान की मानिंद अटे पड़े हैं. एलीट को रिझाने और अपनी बातें उनके दिलों में उतारने के लिए ट्वीट और बल्क मैसेजेज़ की लहर दौड़ाई जा रही है. सुबह सवेरे और तीसरे पहर मन के मानक को मापते हुए सधी और सुरीली आवाज़ में फोन कॉल्स कराए जा रहे हैं. ताकि आपका बोझिल मन हल्का महसूस कर सके. और सुरीली आवाज़ में सधे संदेश आपके दिल और दिमाग़ में उतर सकें.

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आईटी का जन्म भले ही अमरीका जैसे देशों की कोख से हुआ हो. लेकिन इसके सिर का महाप्रलय भारत जैसे देश ने ही ख़त्म किया. Y2K की हड्डी जब इसके गले में अटकी थी. तो भारतवंशी लाल की उंगलियों ने ही इसका उद्धार किया था. इस गर्व की अनुभूति अमरीकी चुनावों के बाद भारत में चुनावी प्रचार अभियानों के लिए इस आईटी के प्रयोग का तत्पर और त्वरित रास्ता सहज तौर पर तैयार कर दिया. जिसके नतीजे में आज प्रचार को हाईटेक करना चुनाव जीतने की बुनियादी ज़रूरत समझी जाने लगी है. जिसे हर पांचवें या आठवें हाथ में पहुंचे स्मार्ट फोन ने बेहद आसान कर दिया है. लिहाज़ा बिहार के चुनाव रहे हों. या असम का सियासी रण. हाईटेक प्रचार रथ उन गांवों तक पहुंचे. जिन गांवों में पहुंचने के लिए पगडंडियों पर चलना पीढ़ियों की परिपाटी रही है. जहां सिर पर सेहरा सजाए दूल्हे का घोड़ी चढ़ना.  नववधू का कोहबर में पदार्पण और विदाई खास सीज़न में करने की परिपाटी है. जब कि खेत-खलिहान मैदान बन जाते हैं.

लोकतंत्र का पर्व दरअसल 21वीं सदी में आकर चुनावी रण में बदल गया है. जिसमें नेताओं की जमात नैतिकता और सुचिता की बातों को कायरता के प्रलाप से ज़्यादा कुछ नहीं समझती है. तो जहां मनमतंगता इतनी हावी हो. और मानवता के मूल्य और संवेदनाएं इस क़दर मर-मिट गई हों. वहां हार-जीत के महान मकसद के आगे मानव जाति दो पाए मवेशियों की बीड़ से ज़्यादा भला क्या अहमियत रखेगी. जहां भूखे पेटों की आग को चुनावी प्रचार अभियानों के दौरान सिर्फ़ इसलिए खोजकर सिर्फ़ इसलिए महसूस किया जाता हो. ताकि ये संदेश दिया जा सके. कि हम नेता ज़रूर हैं. लेकिन समाजसेवा और जनता का दर्द समझने की सलाहियत औरों से हममें ज़्यादा है. तो क्या ऐसे राजनेताओं को उनके छद्म राष्ट्रवाद की अनदेखी करते हुए भारत भाग्य विधाता बना देना अपने पैरों को कुल्हाड़ी पर मारने जैसा नहीं है. अपने मुस्तक़बिल को मौत से पहले सुपुर्दे ख़ाक करने जैसा नहीं है. आप सोचिए. आपको सोचना होगा. वरना. बनावटी विचारों की इस चुनावी आंधी में मानवता और राष्ट्र की चिंता कहीं रेत के टीलों में दबकर रह जाएगी. जो आने वाले हर चुनावी पर्व में इस तरह की बेमौसम की बरसात और सियासी गर्मियों को झेलते हुए कुछ ही सालों में एक टीले और चट्टान की शक्ल अख़्तिया कर लेगा. और सच्चाई सौ सिद्धांतों के अन्वेषण के बाद भी सामने नहीं आ सकेगी.

  • शाहिद परवेज़ 
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