Monday, September 20, 2021

 

 

 

तीन तलाक़ पर स्मृति इरानी ने मोहम्मद सलीम को हनुमान चालीसा सुनाने को कहा

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नई दिल्ली: तीन तलाक बिल (2018) को लोकसभा ने पारित कर दिया है. अब इसे राज्यसभा में मंजूरी के लिए पेश किया जाएगा. इसके बाद ही यह कानून की शक्ल ले सकेगा.  सदन में मौजूद 256 सांसदों में से 245 सदस्यों ने इसके पक्ष में मतदान किया, जबकि 11 सदस्यों ने इसका खिलाफ अपना वोट दिया. हालांकि कांग्रेस और एआईएडीएमके ने वोटिंग के दौरान सदन से वॉकआउट किया.

इस बहस के दौरान स्मृति इरानी ने कहा, ”सभी महिलाओं का न्याय सुनिश्चित करेंगे. वो लोग जो इस विधेयक को इस नज़र से चर्चा में भाग ले रहे हैं कि इसको अपराध की नज़र से क्यों देखा जाए. ऐसे लोगों से मेरा निवेदन है कि अगर इस्लामिक इतिहास देखा जाए तो दूसरे ख़लीफ़ा के सामने पहली बार ऐसा केस आया. जब एक व्यक्ति से पूछा गया कि क्या आपने इस तरह से तलाक़ दिया है. जब व्यक्ति ने स्वीकार किया तो उस वक़्त उसे 40 कोड़ों की सज़ा सुनाई गई. इसका मतलब है कि इस्लाम में तलाक को एक औरत के ख़िलाफ़ अपराध माना गया है.”

सीपीआई (एम) सांसद मोहम्मद सलीम ने इस पर स्मृति को रोककर ख़लीफ़ा का नाम पूछते हुए कहते हैं- नाम बताइए मैडम नाम. स्मृति सलीम को जवाब देती हैं, ”हज़रत साहेब का नाम मेरे मुंह से सुनना चाहते हैं तो मैं भी आपके मुंह से हनुमान चालीसा सुनना चाहूंगी. कभी दम हो तो सुना दीजिएगा.’

सभी संशोधन प्रस्ताव गिरे

इस बिल के खिलाफ लाए गए सभी संशोधन प्रस्ताव सदन में गिर गए. सदन में असदुद्दीन ओवैसी का संशोधन प्रस्ताव भी गिर गया. इसके पक्ष में सिर्फ 15 वोट ही पड़े. सदन में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने बिल को ज्वाइंट सिलेक्ट कमेटी के पास भेजने की मांग की. वहीं, एआईएमआईएम के असदउद्दीन ओवैसी और कांग्रेस की दो सांसद सुष्मिता देव और रंजीत रंजन ने तीन तलाक देने के दोषी को जेल भेजे जाने के प्रावधान का विरोध किया.

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चर्चा का जवाब देते हुए केंद्रीय विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि जब पाकिस्तान, बांग्लादेश समेत 22 इस्लामिक देशों ने तीन तलाक को गैर-कानूनी करार दिया है तो भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में तीन तलाक को अपराध मानने में क्या परेशानी है? महिला सशक्तिकरण के लिए यह बिल जरूरी है.

विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि एफआईआर का दुरुपयोग न हो, समझौते का माध्यम हो और जमानत का प्रावधान हो, विपक्ष की मांग पर ये सभी बदलाव बिल में किए जा चुके हैं. यह बिल किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है. जब यह संसद बच्चियों से दुष्कर्म करने वालों के लिए फांसी की सजा पर मुहर लगा चुकी है तो यही संसद तीन तलाक को खत्म करने की आवाज क्यों नहीं उठा सकती? दहेज प्रताड़ना, घरेलू हिंसा जैसे कानूनों में भी सजा का प्रावधान है. उस पर इस सदन ने विरोध नहीं किया. फिर तीन तलाक के मामले में विरोध क्यों हो रहा है?

बता दें कि सरकार ने तीन तलाक को अपराध करार देने के लिए सितंबर में अध्यादेश जारी किया था। इसकी अवधि 6 महीने की होती है. लेकिन अगर इस दरमियान संसद सत्र आ जाए तो सत्र शुरू होने से 42 दिन के भीतर अध्यादेश को बिल से रिप्लेस करना होता है. मौजूदा संसद सत्र 8 जनवरी तक चलेगा. अगर इस बार भी बिल राज्यसभा में अटक जाता है तो सरकार काे दोबारा अध्यादेश लाना पड़ेगा.



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