शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में शनिवार को कहा गया कि कांग्रेस, जो राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष में है, “कमजोर और विघटित” हो गई है। ऐसे में शिवसेना सहित सभी भाजपा विरोधी दलों को यूपीए के बैनर तले एकजुट होना चाहिए।

सामना में किसान आंदोलन को लेकर कांग्रेस पर भड़ास निकालते हुए कहा गया कि केंद्र में सत्ता में बैठे लोग किसानों के विरोध के प्रति उदासीन है और सरकार की उदासीनता के पीछे “अप्रभावी” विपक्ष सबसे प्रमुख कारण है। अखबार ने कहा कि केंद्र सरकार को दोष देने के बजाय, मुख्य विपक्षी दल को अपने नेतृत्व के मुद्दे के बारे में आत्मनिरीक्षण करना चाहिए।

सामना में लिखा गया, “दिल्ली की सीमा पर किसानों का आंदोलन शुरू है। आंदोलन को लेकर सत्ता में बैठे लोगों की बेफिक्री दिख रही है। इस बेफिक्री का कारण है देश का कमजोर विपक्ष। केंद्र में मौजूदा विपक्ष बेजान हो चुका है। हालिया विपक्षियों की अवस्था बंजर गांव के मुखिया का पद संभालने जैसी है। इसीलिए महीने भर से दिल्ली की सीमा पर बैठे किसान की सुध लेने वाला कोई नहीं। लिहाजा बंजर गांव की हालत सुधारनी होगी ही। इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी या गृह मंत्री अमित शाह जिम्मेदार नहीं है। इसकी जिम्मेदारी विपक्ष की है।”

आगे कहा गया कि “राहुल गांधी व्यक्तिगत रूप से एक मजबूत लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन कुछ कमी है। कांग्रेस की अगुवाई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की वर्तमान स्थिति एक एनजीओ की तरह है। यहां तक ​​कि यूपीए घटक भी किसानों के विरोध को गंभीरता से नहीं लेते हैं।

“राकांपा प्रमुख शरद पवार राष्ट्रीय स्तर पर एक स्वतंत्र व्यक्तित्व हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी एक अकेली लड़ाई लड़ रही हैं। देश की विपक्षी पार्टी को इस समय उनके साथ खड़ा होना चाहिए। ममता बनर्जी ने केवल पवार से संपर्क किया है और वे बंगाल जा रहे हैं। , लेकिन यह कांग्रेस के नेतृत्व में किया जाना चाहिए था”

तृणमूल कांग्रेस, शिवसेना, अकाली दल, बीएसपी, समाजवादी पार्टी, जगन मोहन रेड्डी, नवीन पटनायक, कुमारास्वामी की पार्टी, चंद्रशेखर राव, नवीन पटनायक की पार्टी और नेता बीजेपी के विरोधी है. लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व में जो यूपीए है उसमें यह लोग शामिल नहीं है। ऐसे में बीजेपी विरोधी इन पार्टियों का यूपीए में शामिल हुए बिना विपक्ष का बाण सरकार पर नहीं चलने वाला है।”