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संसद के शीतकालीन सत्र में कामकाज नहीं होने को लेकर बीजेपी  के सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी की नाराजगी का सहारा लेते हुए शिवसेना ने बीजेपी पर तंज कसते हुए कहा कि बीजेपी को आडवाणी की चिंता पर ध्यान देना चाहिए.

आडवाणी को भारतीय राजनीति का भीष्म पितामह बताते हुए शिवसेना ने नोटबंदी पर चर्चा के लिए एक विशेष सत्र बुलाने की मांग की हैं. साथ ही कहा कि आडवाणी कांग्रेस के नेता नहीं हैं. ऐसे में उन्होंने देश में संसदीय लोकतंत्र को लेकर एक सवालिया निशान खड़ा किया है.

शिवसेना के मुखपत्र सामना के एक संपादकीय में कहा गया है, यह गौर किया जाना चाहिए कि आडवाणी कांग्रेस के नेता नहीं हैं. इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि वह गैर-कांग्रेसी राजनीति के अगुवा रहे हैं. मई 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसद भवन में प्रवेश याद दिलाते हुए कहा कि पीएम ने संसद की सीढि़यों पर माथा टेका था और उनके आंसू भी छलक आए थे.

इसके विपरीत पिछले दो साल से संसदीय कार्यवाही के तमाशा के कारण संसद की आत्मा खो गयी है और यह आंसू बहा रही है. शिवसेना ने कहा कि संसद का मतलब लोगों की समस्या के मुद्दे पर गंभीर बहस करना होता है. लेकिन विपक्ष सवाल उठाता है और हंंगामा करता है जबकि सरकार इन मुद्दों से दूर भागती है. यह आज की तस्वीर है.


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