Thursday, August 5, 2021

 

 

 

यूपी की 32 संसदीय सीटों पर हार-जीत में मुस्लिमों का सीधा दखल, क्या माया-अखिलेश कर पाएंगे नजरअंदाज?

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2019 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा ने गठजोड़ कर सीटों का बंटवारा कर लिया है। हालांकि इस दौरान मुस्लिम राजनीतिक दलों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया। किसी भी राजनीतिक दल के लिए एक भी सीट नहीं छोड़ी गई। जिसको लेकर अब गठबंधन का तीखा विरोध हो रहा है।

इसी बीच जानना जरूरी है कि प्रदेश में कुल 32 संसदीय सीटों पर हार-जीत में मुस्लिमों का सीधा दखल होता है। हालांकि, 2014 के चुनावों में मुस्लिम, दलित और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं के वोट में बिखराव के कारण भाजपा की यहाँ पर 30 पर सीट जीत दर्ज हुई थी। दो पर सपा की जीत हुई थी।

बता दें कि यूपी में करीब 19.5 फीसदी मुस्लिम आबादी है। राज्य के 32 संसदीय सीटों और करीब 125 विधान सभा सीटों पर इनका प्रभाव है। इनके वोट से वहां हार जीत तय होती है क्योंकि यहां मुस्लिम वोट 15 फीसदी से ज्यादा है। पश्चिमी यूपी की करीब दर्जन भर ऐसी संसदीय सीटें हैं जहां 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम वोटर हैं।

पश्चिमी यूपी की मुस्लिम बहुल सीटों में सहारनपुर (39%), कैराना (39%), मुजफ्फरनगर (37%), मुरादाबाद (45%), बिजनौर (38%), अमरोहा (37%), रामपुर (49%), मेरठ (31%), संभल (46%), नगीना (42%) और बागपत (25%) शामिल हैं। इनके अलावा करीब डेढ़ दर्जन सीटों पर 15 से 20 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं। इनमें गाजियाबाद, अलीगढ़, बहराइच, बरेली, श्रावस्ती, बदायूं, पीलीभीत, आजमगढ़, गोंडा, डुमरियागंज, वाराणसी प्रमुख संसदीय सीटे हैं।

दूसरी और गठबंधन में मुस्लिम पार्टियों को शामिल न करने को लेकर राष्ट्रीय ओलमा कौंसिल के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना आमिर रशादी ने लखनऊ में एक प्रेस वार्ता कर गठबंधन को मुसलमानों के लिए ‘ठगबंधन‘ करार दिया। उन्होंने कहा कि सपा-बसपा गठबंधन मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व को खत्म करने की साजिश है। उन्होंने कहा कि अगर गठबंधन को मुस्लिम समाज का वोट चाहिए तो उन्हें 16 सीटों की हिस्सेदारी भी दें।

मौलाना रशादी ने कहा कि, ‘सेकुलरिस्म के नाम पर बने इस तथाकथित गठबंधन में सबसे ज़्यादा अगर कोई खुद को ठगा महसूस कर रहा है तो वो मुस्लिम समाज है क्योंकि दशको से मुस्लिम समाज ने परम्परागत तरीके से सपा-बसपा को वोट दिया है और 70 सालों से सेकुलरिज़्म लगातार सेकुलरिस्म की बुनियाद को मजबूत किया है परंतु इस गठबंधन से मुस्लिम नेतृत्व वाले दलों को दूर रखना न केवल सपा-बसपा का मुस्लिम नेतृत्व वाले दलों के प्रति राजनैतिक दुर्भावना है बल्कि समाजिक न्याय के मूल्यों के भी विरुद्ध है।’

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