Tuesday, November 30, 2021

जीतन राम मांझी ने औरंगजेब न्यायप्रिय शासक, कहा – हिंदुओ के नरसं’हार का आरोप झूठा

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बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और हम नेता जीतन राम मांझी ने मुगल बादशाह औरंगजेब को न्यायप्रिय शासक करार देते हुए कहा कि उनके खिलाफ हिंदुओ के नरसंहार का आरोप झूठा है।

उन्होंने कहा है कि औरंगजेब अच्छा शासक था। न्याय पूर्वक काम करता था। जब पत्रकारों ने औरंगजेब द्वारा किए गए हिंदुओं की हत्या पर सवाल पूछा तो मांझी ने कहा कि हत्या का आरोप नहीं है साबित कहाँ हुआ है। दरअसल, गिरिराज सिंह ने कांग्रेस पार्टी को औरंगजेब की पार्टी करार देते हुए गांधी परिवार पर भी हमला किया था।

गिरिराज सिंह ने कहा था कि देश की सुरक्षा में लगे युद्ध पोतों को राजीव गांधी ने अपनी मौज मस्ती में लगा रखा था। और सीमाएं दुश्मन के हमले के लिए खाली छोड़ रखा था। जिसका बचाव करते हुए मांझी ने औरंगजेब को अच्छा शासक बताया।

इससे पहले कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने वाराणसी में मीडिया के सामने पीएम मोदी को आधुनिक समय का औरंगजेब बताया था। मांझी ने निरुपम के इस बयान का भी समर्थन किया था। अब उन्होने उन्होंने खुलकर औरंगजेब को सच्चा, अच्छा, नेक और न्यायप्रिय शासक बताया।

अबुल मुज़फ़्फ़र मुहिउद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब आलमगीर जिसे आमतौर पर औरंगज़ेब या आलमगीर (प्रजा द्वारा दिया हुआ शाही नाम जिसका अर्थ होता है विश्व विजेता) के नाम से जाना जाता है। भारत पर राज करने वाले छठे मुग़ल शासक थे।

औरंगजेब के प्रशासन में दूसरे मुगल बादशाह से ज्यादा हिंदू नियुक्त थे और शिवाजी भी इनमें शामिल थे। मुगल इतिहास के बारे में यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि दूसरे बादशाहों की तुलना में औरंगजेब के शासनकाल में सबसे ज्यादा हिंदू प्रशासन का हिस्सा थे।

ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि औरंगजेब के पिता शाहजहां के शासनकाल में सेना के विभिन्न पदों, दरबार के दूसरे अहम पदों और विभिन्न भौगोलिक प्रशासनिक इकाइयों में हिंदुओं की तादाद 24 फीसदी थी जो औरंगजेब के समय में 33 फीसदी तक हो गई थी। एम अथर अली के शब्दों में कहें तो यह तथ्य इस धारणा के विरोध में सबसे तगड़ा सबूत है कि बादशाह हिंदू मनसबदारों के साथ पक्षपात करता था।

औरंगजेब की सेना में वरिष्ठ पदों पर बड़ी संख्या में कई राजपूत नियुक्त थे। मराठा और सिखों के खिलाफ औरंगजेब के हमले को धार्मिक चश्मे से देखा जाता है लेकिन यह निष्कर्ष निकालते वक्त इस बात की उपेक्षा कर दी जाती है कि तब युद्ध क्षेत्र में मुगल सेना की कमान अक्सर राजपूत सेनापति के हाथ में होती थी।

इतिहासकार यदुनाथ सरकार लिखते हैं कि एक समय खुद शिवाजी भी औरंगजेब की सेना में मनसबदार थे। कहा जाता है कि वे दक्षिण भारत में मुगल सल्तनत के प्रमुख बनाए जाने वाले थे लेकिन उनकी सैन्य कुशलता को भांपने में नाकाम रहे औरंगजेब ने इस नियुक्ति को मंजूरी नहीं दी।

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