नई दिल्ली | उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजो ने सभी दलों को हैरत में डाल दिया. उत्तर प्रदेश की जनता ने बीजेपी को प्रचंड बहुमत देते हुए बाकी दलों का लगभग सफाया ही कर दिया. दलित वोट बैंक की पुरोधा बनी मायावती को प्रदेश की जनता ने नकारते हुए 1989 के दौर में पहुंचा दिया. तभी भी बसपा 20 सीट नही जीत पाई थी. कमाबोश यही स्थिति जाट नेता चौधरी अजित सिंह की रही.

पश्चिम उत्तर प्रदेश में अच्छी खासी पकड़ रखने वाले अजित सिंह को केवल एक सीट से संतोष करना पड़ा. वही समाजवादी पार्टी यादव बहुल इलाको में भी अपनी साख खोती दिखाई दी. ऐसे में सवाल उठता है की बीजेपी की प्रचंड जीत में क्या मुस्लिम ,जाट और दलित वोट बैंक का काफी बड़ा योगदान रहा. नतीजे आने के बाद भी यह बहस जारी है की क्या मुस्लिम और जाट मतदाताओ ने बीजेपी को काफी बड़ी संख्या में वोट दिया?

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जब इसकी पड़ताल की गयी तो कुछ आंकड़े निकलकर आये. इन आंकड़ो में 2014 में हुए लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनावो में बीजेपी को मिली वोट परसेंटेज को देखा गया. 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में 59 मुस्लिम बहुल सीटो पर बीजेपी को करीब 43 फीसदी वोट मिले थे. इन चुनावो में बीजेपी को वोट परसेंटेज गिरकर 39 फीसदी रह गया. जबकि बाकी दो पार्टियों बसपा और सपा को क्रमशः 29 और 18 फीसदी वोट मिले.

अगर दोनों दलों के वोट जोड़े जायेगे तो करीब 47 फीसदी वोट दोनों पार्टियों को मिले. लोकसभा चुनावो में यह आंकड़ा 43 फीसदी था. ऐसे मे कहा जा सकता है दोनों ही दल अपना वोट बैंक बचाकर रखने में कामयाब रहे. इन इलाको में करीब एक चौथाई मुस्लिम वोटर है. हालाँकि यह कहना मुश्किल होगा की बीजेपी को मिले वोट शेयर में मुस्लिमो का वोट शेयर कितना है?

उधर जाटो के वोटो की बात की जाए तो माना जाता है की लोकसभा चुनावो में जाटो ने बीजेपी को भरपूर समर्थन दिया था जिसकी वजह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी को भरी सफलता मिली थी. लेकिन इस बार जाटो का रुख चौधरी अजित सिंह की पार्टी की और ज्यादा दिखाई दे रहा था. आंकड़ो की बात करे तो जाट बहुल इलाको में बीजेपी को करीब 45 फीसदी वोट मिली है. जबकि 2012 विधानसभा चुनावो में यह आंकड़ा केवल 16 फीसदी था. जबकि अजीत सिंह को 11 फीसदी वोट मिले थे जो अब घटकर 6 फीसदी रह गए.

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