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भोपाल: गुरुवार को सेक्शन 377 के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने फैसला सुनाते हुए LGBT समुदाय के रिश्तों को मान्यता प्रदान कर दी है। बेंच ने एकमत से 158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के उस हिस्से को निरस्त कर दिया जिसके तहत सहमति से परस्पर अप्राकृतिक यौन संबंध अपराध था।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद पांच साल पहले अप्राकृतिक कृत्य में फंसे मध्यप्रदेश के पूर्व वित्तमंत्री और बीजेपी नेता राघवजी कोबचने के लिए एक उम्मीद की किरण नजर आई है। राघवजी ने कहा, मेरे मामले में अप्राकृतिक कृत्य जैसी स्थिति नहीं है। यह साजिश के तहत झूठा केस है। सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 हटा दी है। इससे मेरा मामला भी खत्म हो जाएगा। उन्होंने कहा, मेरे पास अब इन आरोपों पर स्थिति स्पष्ट करने का मौका नहीं रहेगा। मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैंने ऐसा कुछ नहीं किया और न ही ऐसी कोई घटना हुई।

राघवजी ने बताया कि मेरा मामला अलग मामला है क्योंकि इसमें कोई अप्राकृतिक यौन संबंध नहीं था। षड्यंत्र के तहत, इस मामले को गलत तरीके से बनाया गया, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। लेकिन एससी ने धारा 377 को निर्णायक कर दिया है जो इस मामले को डिफ़ॉल्ट रूप से बंद कर देता है।  राघवजी के केस की पैरवी कर रहे वकील हरीश मेहता का कहना है सुप्रीम कोर्ट के धारा 377 पर दिए गए फैसले का अध्ययन किया जा रहा है। एक अन्य सीनियर एडवोकेट अजय गुप्ता का मानना है राघवजी का केस, अपने घरेलू नौकर के साथ सहमति से सेक्स का नहीं है।

जनसंघ से लेकर भाजपा तक प्रदेश के कद्दावर नेताओं में से एक राघवजी ने चार इमली स्थित अपने सरकारी बंगले में सरकारी नौकरी दिलाने का लालच देकरअपने नौकर के साथ अन नैचरल सेक्स किया था। इस मामले में पीड़ित नौकर ने 5 जुलाई को हबीबगंज थाने में यौन शोषण का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी। हबीबगंज थाना पुलिस ने राघवजी के साथ शेर सिंह और सुरेश सिंह पर आईपीसी की धारा 377 और 506 के तहत केस दर्ज किया था।

इस घटना की सीडी सामने आने के बाद प्रदेश की राजनीति में भूचाल मच गया था। सीडी सामने आने के बाद राघवजी को इस्तीफा देना पड़ा था। मामले के उजागर होने के बाद राघवजी के साथ शिवराज सरकार की भी खूब किरकिरी हुई थी।

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