लखनऊ | उत्तर प्रदेश के चुनाव नजदीक आ गए है. करीब एक महीने बाद प्रदेश में मतदान का पहला चरण शुरू होगा. ऐसे समय में सभी पार्टिया चुनाव की तैयारियो में लग जाती है, उम्मीदवारो के नाम फाइनल कर देती है. लेकिन सूबे की सत्ताधारी पार्टी अभी भी अंदरूनी झगडे के जाल में फंसी हुई है. पार्टी दो खेमे में बंट चुकी है और दोनों ही खेमे को अभी तक यह नही पता की वो किस चुनाव चिन्ह पर इलेक्शन लड़ेगी.

दोनों ही खेमे पार्टी सिंबल ‘ साइकिल ‘ पर अपना दावा जता रहे है , ऐसे में चुनाव आयोग सिंबल को फ्रीज कर दोनों खेमो को अलग सिंबल जारी कर सकती है. हालांकि अभी भी दोनों खेमो के बीच अभी भी सुलह की कोशिशे की जा रही है. सूत्रों के हवाले से खबर मिली है की मुलायम सिंह पार्टी को बचाने के लिए झुकने को तैयार हो गए है.

मुलायम भी जानते है की अगर अखिलेश अलग चुनाव लड़ता है तो पार्टी को बड़ा नुक्सान झेलना पड़ेगा. ऐसे में समाजवादी पार्टी के वोटर बसपा की तरफ भी झुक सकते है जिससे प्रदेश में बीजेपी मजबूत होकर उभर सकती है. इसलिए खबर है की मुलायम चुनाव संपन्न होने तक अखिलेश के ऊपर ही दाँव चलना चाहते है. अखिलेश ने भी केवल तीन महीने का समय माँगा है.

सूत्रों के अनुसार अखिलेश की मांग को मानते हुए मुलायम ने उन्हें राष्ट्रिय अध्यक्ष के रूप में स्वीकार कर लिया है. अखिलेश चुनाव तक पार्टी की कमान खुद सँभालना चाहते थे, इस पर मुलायम ने अपनी सहमती दे दी है. मुलायम यह भी नही चाहते की चुनाव आयोग ‘साइकिल’ सिंबल को फ्रीज करे. आज ही चुनाव आयोग ने दोनों खेमो को नोटिस भेज हलफनामा जमा करने का आदेश दिया है.

इसलिए अखिलेश ने सभी विधायको की मीटिंग बुलाकर उनसे हलफनामे पर हस्ताक्षर ले लिए. अखिलेश इस हलफनामे को चुनाव आयोग के पास भेजेंगे. अखिलेश साबित करना चाहते है की पार्टी के 90 फीसदी से ज्यादा विधायक उनके समर्थन में है. यही बात मुलायम और शिवपाल के लिए चिंता का विषय है. अब दोनों को लग रहा है की चुनाव आयोग पार्टी सिंबल को फ्रीज कर सकता है.

ऐसे में मुलायम और शिवपाल ने पीछे हटने में ही भलाई समझी है. खबर है की मुलायम ने झगडे को खत्म करने या कुछ समय के लिए टालने के संकेत दिए है. मुलायम , अखिलेश के नेतृत्व में चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गए है. इसी के साथ ही कांग्रेस और राष्ट्रिय लोकदल के साथ समाजवादी पार्टी के गठबंधन का रास्ता भी साफ़ हो गया है. अखिलेश चुनाव से पहले कांग्रेस और लोकदल से समझौते के पक्ष में थे लेकिन शीर्ष नेतृत्व इससे मना कर रहा था.


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