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नोटबंदी के कारण देश में कितनी काली कमाई छिपाई गई, कितना पैसा बैंकों के पास नहीं पहुँचा और कितनी चोरों ने जेल जाने के डर से करेंसी को नष्ट कर दिया, इसका ख़ुलासा तो नए साल में हो जाएगा लेकिन संसद के इस सत्र को जिस तरह विपक्ष ने डुबो दिया उससे लगता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आर्थिक सुधार की योजना को पलीता लगाने में कोई पीछे नहीं। नोटबंदी में तबाह सत्र में उम्मीद के मुताबिक़ काम नहीं हो पाया और इससे लगता है आर्थिक सुधार की बजाय अपने वोट बैंक और राजनीति की परवाह कर रही सभी विपक्षी पार्टियों ने राष्ट्रीय चरित्र के विपरीत कार्य किया है। मुद्दा तो यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विमुद्रीकरण से जिस काले धन पर चोट की है और चूँकि पीड़ित लोग अभिजात्य राजनीतिक वर्ग से आते हैं, ऐसे में उनके पास प्रधानमंत्री की योजनाओं और स्पीड पर क़ाबू  पाने के लिए संसद के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिन आर्थिक सुधारों की पहल की है, उसके लिए जितनी राजनीतिक इच्छा शक्ति चाहिए, वह उन्होंने प्रदर्शित की है। ऐसा नहीं है कि बिना टैक्स के जमा करके रखे गए धन से सिर्फ़ व्यापारी और माफ़िया ही प्रभावित हुए हों या ग़ैर भारतीय जनता पार्टी के राजनेताओं का ही नुक़सान हुआ हो। ज़ाहिर है उनकी पार्टी के लोगों को भी हानि हुई है परंतु चालीस चोरों के सामने अली बाबा की तरह डटे नरेन्द्र मोदी पीछे हटने को तैयार नहीं। इस निर्णय से विपक्षी पार्टियों ने देश की प्रगति में मील का पत्थर साबित होने वाले कई मसौदों को फँसा कर अपनी राजनीतिक तुच्छता का परिचय दिया है।

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अपनी गति के मुताबिक़ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने सहयोगी नीति आयोग और वित्त मंत्रालय की मंत्रणा के अनुसार अगले वित्तीय वर्ष से देश को यह भरोसा दिलाना चाहते हैं कि ग़ैर बराबर और उलझाव वाले सभी क़ानूनों की जगह एक माल एवं सेवाकर यानी जीएसटी को लागू कर वह देश में समान आर्थिक प्रतियोगिता, एकल खिड़की योजना और इंस्पेक्टर राज के रूप में कार्य कर रही नौकरशाही को क़ाबू में करके आर्थिक परिदृश्य बदलना चाहते हैं। अपने चुनावी वादों के मुताबिक़ देसी काले धन को विमुद्रीकरण की चोट से का़बू में करने से बैंकों को यह लाभ हुआ है कि उनके ख़ज़ाने भर गए हैं और वह नए ऋण देने को तैयार हैं, उनकी डूबत खाता बैलेंस में आई है और वह सरकारी मदद की आस से मुक्त हुए हैं। जीएसटी बिल की आस में कई विदेशी कम्पनियाँ भारत का रुख़ परख रही हैं और यदि नए वित्तीय वर्ष में हम इसे लागू करने में कामयाब हो जाते हैं तो भारत ने आर्थिक उदारीकरण के बाद आज तक जितनी प्रगति की है, हो सकता है उतनी हम हर साल करने लगें।

इनडायरेक्ट टैक्स सुधारों के लिए देश के उपभोक्ता और व्यापारी लम्बे समय से जीएसटी की आस में हैं। यह ना सिर्फ़ टैक्स के नियमों को सरल करेगा, प्रतियोगिता पर आधारित होगा, कर राजस्व को बढ़ाएगा और जनता को कर समझने वाले झमेलों से निकालकर उन्हें इस बात से अवगत करवाएगा कि उन्होंने जो कर दिया है, वह किस रूप में कहाँ जा रहा है। निर्यातकों में तो जीएसटी को लेकर बहुत इंतज़ार है।

माल और सेवा पर एक समान लगने से कर के निर्धारण को तो आसान बनाया ही जा सकेगा बल्कि मौजूदा पेचीदा निर्धारण से ना सिर्फ़ बिचौलियों बल्कि नौकरशाही की लूट को रोकने का साधन व्यापारी के पास नहीं है। इसलिए भारत में अंसगठित और सूक्ष्म, मझौले और लघु उद्योगपतियों को भारी परेशानी होती है। बहुकर की बजाय एक कर ना सिर्फ़ बिक्री कर, राज्य कर और चूंगी को समाप्त कर एक फॉर्मेट में लोगों को कर समझने और भुगतान करने में आसानी पैदा करेगा। अभी तक हो यह रहा है कि कर की एकरूपता नहीं होने से ना सिर्फ़ नौकरशाही का भ्रष्टाचार के रहम पर व्यापारी चल रहा है बल्कि उपभोक्ताओं को एक ही चीज़ हर राज्य में अलग अलग दाम पर मिल रही है, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण पेट्रोलियम उत्पाद हैं। आम तौर पर हम लम्बी दूरी की सड़क यात्रा पर निकलते हैं तो पेट्रोल पम्पों पर इस प्रकार का प्रचार देखते हैं कि दिल्ली से सस्ता डीज़ल या हरियाणा से सस्ता पेट्रोल। इस तरह की बेमानी मार्केटिंग के सारे मायने समाप्त हो जाएंगे। चीज़ों के दाम समान होने से भारी तादाद में कम लागत में ख़रीद कर अधिक छूट पर बेचने वाले बड़े व्यापारियों से छोटे दुकानदारों के हितों की भी रक्षा की जा सकेगी।

निर्यातक इस समय बेशक डॉलर की गिरती दर से प्रसन्न हों लेकिन आयातक परेशान हैं। यह तराज़ू का पलड़ा है, जिसका बराबर रहना ज़रूरी है। डॉलर के मुक़ाबले रोज़ाना की गिरावट के अलावा हमारे निर्यात को निर्बाध बनाने के उपाय नहीं किए गए तो व्यापार घाटा बढ़ता जाएगा और मुद्रा स्फिति भी बढ़ती जाएगी। हम एक सीमा के बाद रुपए का अवमूल्यन कैसे होने दे सकते हैं। जीएसटी से निर्यातकों को बहुत लाभ होने जा रहा है। कर सरलीकरण से घरेलु माँग कमज़ोर होने पर वही माल आसान कराधन से विदेशी बाज़ार में निर्यात की जा सकेगी। यह क़ानून अधिक करदाताओं का भी निर्माण करेगा और सरकार को वर्तमान करदाताओं से अधिक कर नहीं वसूलना, उसे बाज़ार को अधिक प्रतियोगी बनाकर नए करदाता पैदा करने हैं। इसे इस रूप में समझिए कि कम माल पर अधिक मार्जिन से अधिक उस व्यापार की तरक़्क़ी की संभावना अधिक रहती है जो कम मार्जिन पर अधिक वॉल्यूम का धंधा करे।

एक चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स का ज़िम्मेदार होने के नाते रोज़ाना जीएसटी को लेकर हमारे पास अनगिनत सवाल आते हैं और हम उन प्रश्नों का उत्तर देते समय बहुत हर्ष का अनुभव करते हैं कि लोग जीएसटी को समझना चाहते हैं। जब सभी बिन्दुओं पर बात हो जाती है तो छोटे से लेकर कॉर्पोरेट तक का यही अनुभव होता है कि वह जीएसटी चाहते हैं। बस एक सवाल का जवाब हम नहीं दे पाते कि यदि संसद के अन्दर और बाहर विपक्षी राजनीतिक दल यदि प्रधानमंत्री की आर्थिक सुधार के इस क्रांतिकारी क़दम में साथ नहीं देंगे तो क्या हम उस कर सरलीकरण और विकास की इन्तज़ार करें, जो आप बता रहे हैं। एक क्रांति के नायक को चालीस चोर से जीतना देखना हर कोई चाहता है, चालीस चोरों को छोड़कर।

*लेखक राकेश सिंह एसोचैम उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष और इंस्टिच्यूट ऑफ़ कॉस्ट अकाउंटेंट संस्थान के पूर्व अध्यक्ष हैं।

 

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