Friday, October 22, 2021

 

 

 

लखनऊ का मशहूर ‘हजरतगंज चौराहा’ अब हुआ ‘अटल चौक’

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आपकी पार्टी में महान लोग कम पड़ जाएंगे,कहाँ तक सबके नाम बदल पाएंगे जनाब-ए-आली वज़ीर-ए-आला पुराना सूबा-ए-यूनाईटेड प्रोविंसेज़ मतलब नये उत्तर प्रदेश के योगी जी यूपी सरकार चाहती है कि हज़रतगंज चौराहे का नाम अटल चौक रखा जाए. अटल जी के नाम से तो है ही बाहरी लखनऊ में चौराहा. पुराने चौराहे हज़रतगंज का नाम बदलने की क्या ज़रूरत आन पड़ी. अगर तकलीफ़ दूसरी है लखनऊ के इन नामों को भी बदल डालिए. ये सब मुसलमान नवाबों ने बसाए,आबाद किए.कहाँ तक बदल पाएंगे. मेरे डॉ. शारिक़ के हिसाब से आपके दल में महान लोगों की कमी पड़ जाएगी और पुराने नाम बचे रह जाएंगे.इतने नाम जो हैं.

मुसलमानों द्वारा बसाए बनाए और आबाद किए गए स्थानों के नाम ये रहे आपकी स्क्रीन पर..फ़तेहगंज..रक़ाबगंज..नवाबगंज..नवाज़गंज..मशकगंज. अमजद अली शाह का बसाया हज़रतगंज..नज़रबाग़..मकबूलगंज..हुसैनगंज.अमीनाबाद.मौलवीगंज.वज़ीरगंज.सआदतगंज.अशरफ़ाबाद.चारबाग़.ऐशबाग़.आलमबाग़..नज़रबाग़..क़ैसरबाग़..अमीनुद्दौला का बसाया अमीनाबाद..ख़ुर्शीदबाग़..मूसाबाग़.. बाग़ शेरजंग.. बाग़ क़ाज़ी..दिलकुशाबाग़..बाग़ नाज़िम साहब..नज़ीराबाद..हुसैनाबाद..पुल ग़ुलाम हुसैन..कासिम अली ख़ान का पुल.. कटरा हैदर हुसैन.. कटरा मीरजहाँगीर..कटरा ख़ुदायारख़ान..अकबरी दरवाज़ा.. हैदर हुसैन ख़ान का फाटक.. अहाता ग़नी ख़ान.. अहाता सुलेमान कदर..कटरा अज़ीमबेग..अहाता रसूल ख़ान…..
….अभी सैकड़ों नाम हैं जो मुझे याद हैं. कहाँ तक लिखें.योगी जी आप कहाँ तक बदलेंगे. आपके पास आपके दल के आपकी नज़र में महान दस लोग भी मिलना मुश्किल हो जाएंगे.इसलिए ये इरादा छोड़ दीजिए.

अपना कोई नया और शानदार चौराहा बनाकर उसका नाम अटल चौराहा रख लीजिए.दूसरे के बरधे को अपना कहने से बरधा अपना नहीं हो जाता. मुसलमानों ने अपने ख़ून और पसीने से सींचकर लखनऊ को सजाया-सँवारा और बसाया है.जब बसाया है तब नाम रखे हैं.कोई नाम बदला नहीं है. प्रजा-प्रजा में भेद नहीं किया.मालूम हो कि मुसलमानों ने ही गणेशगंज.अहीरीटोला.ठठेरीटोला.सुन्दरबाग़..बाज़ार टिकैतराय.टिकैतगंज.भवानीगंज.तेलीबाग़.अहाता सूरत सिंह समेत हिंदुओं के नाम से और हिंद की रवायत से जुड़े सैकड़ों स्थान बसाए और उनका नाम रखा और रखने दिया.चाहते तो सबके नाम इस्लामी कर देते. चाहते तो अवध का नाम सूबा-ए-अली कर देते.कौन रोकता. अथाह ताकत थी.लोकतंत्र नहीं था तब.जबान से निकली बात ही कानून बन जाती थी.लिहाज़ा आप ऐसा ना करें. सत्ता तो आनी जानी है. आज आपकी है.कल निज़ाम पलट भी सकता है. सरकारें तो बदलती रहती हैं.कल को किसी सरकार ने गोरखपुर का नाम बदलकर मौलाना आज़ादाबाद कर दिया तब. आपको कैसा लगेगा.इसलिए नाम बदलने का फेरा छोड़ें. अपना कुछ नया बनाएं और उसका नाम मनमर्ज़ी से रखें.

(लेखक परिचय: यह आर्टिकल डॉ. शारिक़ अहमद ख़ान की फेसबुक वॉल से लिया गया है.)

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