Wednesday, June 16, 2021

 

 

 

क्या नोटबंदी का विरोध देशद्रोह है ?

- Advertisement -
- Advertisement -

अभिमन्यु कोहाड़

हमारे प्रधानमंत्री जी नोटबंदी को लेकर सिर्फ वहां बयानबाजी कर रहे हैं जहाँ उनसे कोई सवाल पूछने वाला नहीं है और बयानबाजी भी बिना किसी तर्क की कर रहे हैं। वो संसद में उपस्थित रह कर नोटबंदी के ऊपर उठ रहे सवालों के जवाब नहीं दे रहे हैं क्योंकि वो जानते हैं कि यहाँ उनसे सवाल पूछे जा सकते हैं। संसद लोकतंत्र की आत्मा है और अगर वो संसद में उठ रहे सवालों का जवाब नहीं दे रहे हैं तो इसका अर्थ है कि वो निश्चित रूप से सांविधानिक संस्था को सम्मान नहीं दे रहे हैं। मोदी जी बाहर जाकर रैलियों में कह रहे हैं कि उन्हें संसद में बोलने नहीं दिया जाता, उनकी इस बात पर सवाल यह खड़ा होता है कि पार्लियामेंट में पूर्ण बहुमत होने के बावजूद अगर वो बोल नहीं पाते हैं तो वो एक कमज़ोर नेता हैं और अगर भारत का नेता इतना कमज़ोर होगा तो देश आगे कैसे बढ़ेगा? कैसे देश तरक्की करेगा?

अगर संसद और उसमें उठने वाले सवालों से उन्हें इतनी ही समस्या है तो वो संसद की सदस्यता को छोड़ क्यों नहीं देते हैं और सामाजिक नेताओं की तरह सिर्फ बाहर जा कर काम करें और खूब भाषण दें, लेकिन अब जब वो संसद के सदस्य हैं तो उन्हें जवाब संसद में देना ही पड़ेगा। बाहर जाकर भी अब तक तथ्यों के आधार पर जनता को यह नहीं समझा पा रहे हैं वो कि ये नोटबंदी कैसे फायदेमंद है। चलिये अगर वो संसद में जवाब नहीं देना चाहते हैं वो वो तटस्थ आर्थिक और सामाजिक पैनलों का जवाब दें जिनका राजनितिक पार्टियों से कोई लेना देना नहीं हो ताकि देश को पता तो चले कि आखिर किस तरह से ये नोटबंदी देश के लिए फायदेमंद है।

सुप्रीम कोर्ट में सरकारी वकील ने कहा था कि लगभग 6.5 लाख करोड़ काला धन नगदी के रूप में हिंदुस्तान की आर्थिक व्यवस्था में है तो ये 14.83 लाख करोड़ में से सिर्फ 8.33 लाख करोड़ रुपए बैंकों में आना चाहिए था लेकिन 13 लाख करोड़ से भी ज्यादा बैंकों के अंदर आ चुके हैं तो काला धन कहाँ पकड़ा गया? जवाब दे सरकार?

सेंटर फॉर मोनेटरिंग ऑफ़ इंडियन इकॉनमी की रिपोर्ट के अनुसार इस नोटबंदी पर 1.28 लाख करोड़ का खर्चा आएगा और देश की इकॉनमी 1 महीने में .5 प्रतिशत सिकुड़ चुकी है तो इस तरीके से मार्च तक 2.0 तक सिकुड़ जायेगी जिसका अर्थ है 3 लाख करोड़ का नुकसान। तो देश को कुछ फायदा होने की जगह उल्टा 4.28 लाख करोड़ का नुकसान हो गया, कहीं ऐसे सवालों के जवाब न देने के लिए मोदी जी संसद से तो नहीं भाग रहे हैं? नोटबंदी पर तार्किक सवाल उठाने वालों की तुलना प्रधानमंत्री जी कभी पाकिस्तान से करते हैं तो कभी आतंकवादियों से तो कभी बेईमानों से। क्या मोदी जी का ऐसा व्यहवार प्रधानमंत्री पद की गरिमा के अनुरूप है? मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश का विकास हुआ हो या नहीं, कालाधन वापस आया हो या नहीं, देश की सामरिक स्थिति मजबूत हुई हो या नहीं लेकिन उन्माद और कड़वाहट की राजनीति निश्चित रूप से जरूर बढ़ी है।

जो लोग संसद में नोटबंदी को लेकर सवाल उठा रहे हैं वो खुद एक संस्थान का प्रतिनिधित्व करते हैं, और प्रधानमंत्री जी भी एक संस्थान का नेतृत्व करते हैं, अगर इस तरीके से एक संस्थान दूसरे संस्थानों द्वारा उठाये जा रहे सवालों का जवाब न देकर सिर्फ खिल्ली उड़ाएगा तो निश्चित रूप से लोकतंत्र कमजोर होगा। नोटबंदी के बाद से सिर्फ 47 दिनों में 60 बार नियमों में बदलाव करना सरकार की कार्यशैली को खुद बयान कर रहा है, जब तक इस तरह का वन मैन शो जारी रहेगा तब तक सरकार ऐसी गलतियां करती रहेगी। यह बार बार नियमों में बदलाव दिखाता है कि यह जल्दबाज़ी और उत्तेजना में लिया हुआ फैसला है न कि सोच समझकर लिया हुआ फैसला। देश इस तरह की उत्तेजना और उन्माद की राजनीति से लंबे समय तक नहीं चल सकता है। समय की जरुरत है कि सरकार अपनी इस कार्यशैली में बदलाव करें और सांविधानिक संस्थाओं का सम्मान करें क्योंकि लोकतंत्र की आत्मा संविधान में होती है।atms

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot Topics

Related Articles