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नई दिल्ली | नोट बंदी के एलान के बाद विपक्ष ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया की नोट बंदी अवैध है. सरकार को इस तरह का फैसला लेने का अधिकार नही है. इसी तरह के कुछ सवाल सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार से पूछे है. कोर्ट ने सरकार से पुछा की क्या सरकार को नोट बंदी का फैसला लेने का अधिकार प्राप्त है और क्या इसके लिए संसद की मंजूरी लेना जरुरी था? अब सरकार इन्ही सवालो के जवाब ढूँढने में व्यस्त है.

कानून के अनुसार केंद्र सरकार इस तरह के फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है. लेकिन इसमें कुछ पेंच है. सरकार को यह पूरा अधिकार है की वो किसी भी तरह के नोट को चलन से बाहर कर सकती है. लेकिन आरबीआई एक्ट-1934 के तहत , केंद्र सरकार ऐसा फैसला केवल रिज़र्व बैंक बोर्ड की सिफ़ारिशो के बाद ही लागू कर सकती है.

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इसलिए यह माना जा सकता है की केंद्र सरकार खुद इस तरह का फैसला नही ले सकती. तो क्या रिज़र्व बैंक बोर्ड ने इस तरह की सिफारिश की थी? जब एक आरटीआई में यह सवाल पुछा गया तो आरबीआई ने अपने जवाब में कहा की नोट बंदी के कुछ घंटे पहले आरबीआई के सेंटर बोर्ड ने नोट बंदी की सिफारिश केंद्र सरकार के समक्ष भेजी थी. उस समय आरबीआई सेंटर बोर्ड की बैठक के दौरान 10 में से 8 मेम्बर मौजूद रहे.

इनमे आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल, आर्थिक मामलो के सचिव शक्तिकांत दास, आरबीआई के डिप्टी गवर्नर आर गांधी और एसएस मुंद्रा शामिल थे. रिज़र्व बैंक बोर्ड की सिफारिश करने के कुछ देर बाद ही मोदी सरकार ने कैबिनेट की बैठक बुलाई और नोट बंदी के फैसले पर मोहर लगा दी. मालूम हो की नोट बंदी हुए आज 45 दिन हो चुके है लेकिन हालात अभी भी जस के तस बने हुए है.

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