सलाफी प्रचारक जाकिर नाईक ने अपने संगठन इलामिक रिसर्च फाउंडेशन (आईआरएफ) पर लगाए गए केंद्र सरकार के प्रतिबंध को आज दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनोती दी हैं.

याचिका में दावा किया गया है कि इस किस्म की कार्रवाई के पीछे कोई वजह नहीं बताई गई है. इसमें कहा गया है कि कारण बताओ नोटिस दिए बगैर ही तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया गया. आईआरएफ के मुताबिक अधिसूचना में इसका कोई कारण नहीं दिया गया है और ऐसा कदम उठाने के लिए किसी सामग्री का हवाला भी नहीं दिया है. जबकि उच्चतम न्यायालय के मुताबिक ऐसा जरूरी है.

यह मामला न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा के समक्ष सूचीबद्ध है.उन्होंने संगठन और केंद्र की दलीलों पर आंशिक सुनवाई की और सरकार से कहा कि वह 17 जनवरी को संबधित दस्तावेज पेश करे ताकि अदालत यह देख सके कि संगठन पर तत्काल प्रतिबंध के लिए सामग्री है या नहीं.

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल :एएसजी: संजय जैन द्वारा अदालत में पढ़ कर सुनाई गई केंद्र की अधिसूचना में कहा गया है कि ऐसा कदम तत्काल उठाने की जरूरत इसलिए महसूस की गई क्योंकि संठन के अध्यक्ष नाईक समेत इस संगठन और इसके सदस्यों द्वारा दिए कथित भाषणों और वक्तव्यों से भारतीय युवा कट्टरपंथी बन सकते हैं और विश्वभर में चिंता का विषय बन चुके आईएसआईएस जैसे आतंकी समूहों में शामिल होने के लिए प्रेरित हो सकते हैं.


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