Friday, September 24, 2021

 

 

 

वैश्विक शांति की स्थापना के लिए भारत को सबसे आगे खड़ा करने में सहयोग दें युवा

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लखनऊ, 26 दिसम्बर। इस्लाम निभाने ही नहीं बल्कि इस्लाम में जिस सामाजिक क्रांति का ज़िक्र किया गया है, उसकी अनुपालना के लिए भारत सबसे उपयुक्त देश है। भारत में इस्लाम के हर अरकान को किसी बाधा के पूरा किया जा सकता है। इस्लाम में सामाजिक आंदोलने के लिए भारत की भूमि पर किए गए सूफ़ी संतों के प्रयोगों का यहाँ निष्पक्ष समाज ने खुले दिल से स्वागत किया और आज पूरी दुनिया भारत में सूफ़ी इस्लाम के कामयाब प्रयोगों में शांति का मार्ग तलाश रहे हैं। यह बात आज लखनऊ के यूपी प्रेस क्लब में आयोजित “सूफ़ीवाद – आतंकवाद का हल” विषय पर मौलाना मोहम्मद आजम हशमती अध्यक्ष पासबाने वतन फाउंडेशन ने कही। आयोजन पासबाने वतन फाउंडेशन और मुस्लिम छात्र संगठन मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इंडिया की तरफ़ से किया गया था जिसमें भारी तादाद में लोगों ने हिस्सा लिया।

मौलाना मोहम्मद आजम हशमती ने कहा कि भारत आध्यात्मिक प्रयोगों की भूमि रहा है। उन्होंने दो शानदार उदाहरण देते हुए भारत को सूफ़ीवाद और इस्लाम की सबसे उपयुक्त भूमि बताया। दुनिया की सबसे अधिक इस्लामी पुस्तकें भारतीयों ने लिखी हैं और वह तक़रीबन सूफ़ी इस्लाम पर आधारित हैं जो शांति, सह अस्तित्व और प्रेम का संदेश देती हैं। उन्होंने युवाओं को बताया कि जिसे हिन्दू भगवा रंग कहते हैं, उसे मुसलमान चिश्ती रंग क्यों कहते हैं? उन्होंने समझाया कि हिन्द के सुल्तान ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती रह. ने भारत आने के बाद गेरुए वेशभूषा और पटका को अपनी पोशाक बना लिया था ताकि लोग हिन्दू और मुसलमान के नाम पर विभेद में नहीं पड़ें और उनके शांति के संदेश को सुनें। तभी से भारत के मुसलमानों ने भगवा रंग को चिश्ती रंग कहना शुरू कर दिया। मौलाना मोहम्मद आजम हशमती ने बताया कि आप अजमेर जाएंगे तो हज़ारों लोगों के गलों में भगवा यानी चिश्ती रंग के पटकों, रुमाल और शॉल को देखेंगे। आपको इसके पीछे की वजह पता करनी चाहिए। यह ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती रह. की डाली गई परम्परा है जिसे लोग इस अशांति, संशय और हिंसा के माहौल में भी निभाते हैं। यह आपको सिर्फ़ भारत में देखने को मिलेगा। उन्होंने युवाओं से ख़्वाजा साहब के संदेश को आत्मसात करते हुए सामाजिक सहअस्तित्व को बढ़ाने का आह्वान किया।

युवा क्रांति और आतंकवाद में अंतर समझें – मौलाना इरफानूल हक़ कादरी

इस अवसर पर प्रख्यात सूफ़ी विचारक मौलाना इरफानूल हक़ कादरी ने कहा कि भारत में अब भी कट्टरता वह स्थान नहीं बना पाई है जिसका इरादा हर अशांत प्रवृत्ति के देश, संगठन एवं व्यक्ति चाहते हैं। मौलाना इरफानूल हक़ कादरी ने सूफ़ी परम्परा को याद करते हुए युवाओं से अपील की कि वह क्रांति और आतंकवाद में फर्क़ को समझें। क्रांति बदलाव, शांति, प्रेम और सहअस्तित्व का प्रवाह करती है जबकि आतंकवाद बेगुनाह लोगों की हत्या, अन्याय, भया और अस्थिरता की तरफ़ ले जाता है। इस्लाम की मंशा दुनिया में शांति स्थापना की रही है। आप देखेंगे कि भारत में ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती रह. के आने के बाद राजनीतिक स्थिरता, सहअस्तित्व और रूहानी प्रेम की एक अनूठी परम्परा शुरू हुई जो बाद में भक्ति काल से आधुनिक भारत तक व्याप्त है। मौलाना इरफानूल हक़ कादरी ने समझाया कि हमें साथ रहकर दुनिया में व्याप्त अशांति और आतंकवाद के माहौल में सूफ़ीवाद के ज़रिए शानदार मिसाल क़ायम करते हुए सामाजिक संदॆश देने का प्रयास करते रहना है।

इमाम हुसैन का बलिदान शांति के लिए – मौलाना मोहम्मद इशतियाक कादरी

मौलाना मोहम्मद इशतियाक कादरी ने कहा कि पूरे अरब में आज इस्लाम के नाम पर सिर्फ़ अशांति ही नहीं बल्कि वहाँ किंगडम के नाम पर सत्ताधारी अधिनायकवादियों ने जनता की आवाज़ को नहीं, बल्कि उदार इस्लाम की आवाज़ को भी दबा दिया है। अधिनायकवाद और इस्लाम के नाम पर कट्टरवाद विचारधारा के प्रसार और प्रश्रय ने लोगों का जीना हराम कर दिया है। आतंकवाद और राजनीतिक संकट की इस घड़ी में अरब के मुसलमान भी भारत की तरफ़ देख रहे हैं क्योंकि भारत में दुनिया का सबसे अधिक मुसलमान अन्य समाजों के साथ शांतिपूर्वक रह रहा है। मौलाना मोहम्मद इशतियाक कादरी ने उदाहरण देते हुए बताया कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब और उनके नाती इमाम हज़रत हुसैन ने भारत के प्रति अपने प्रेम का इज़हार 1400 वर्ष पूर्व ही कर दिया था। उन्होंने समझाया कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब के मुख से सुनकर ही इमाम हज़रत हुसैन ने अधिनायकवादी यज़ीद से संघर्ष के बजाय भारत आने की इच्छा जताई थी लेकिन यज़ीद आख़िरकार नहीं माना। उन्होंने बताया कि इमाम हज़रत हुसैन जानते हैं कि भारत शांति, सहअस्तित्व और स्वागत की भूमि है। जो संदेश पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब और इमाम हज़रत हुसैन के मुख से निकले हैं, वह कालाखंड में नहीं बाँटे जा सकते, यह सर्वकालिक है।
मौलाना मोहम्मद इशतियाक कादरी ने युवाओं को समझाया कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब का घराना यानी हज़रत इमाम हुसैन और 72 घर वालों ने शांति और अन्याय के आगे नहीं झुकने के लिए बलिदान दे दिया। इमाम हज़रत हुसैन ने अपने घर मदीना में अशांति के बजाय, शहर छोड़ना उचित समझा। यह शांति स्थापना के लिए अपनी जन्मभूमि और प्राण के बलिदान का इतिहास का सबसे महान् उदाहरण है। हमें इससे सीख लेते हुए देश प्रेम और शांति के प्रयासों की स्थापना के लिए प्रण प्राण से पेश पेश रहना चाहिए।

वैश्विक शांति में भारत को लीडर बनाएं सूफ़ी युवा – डॉ सुनील सिंह प्रोफेसर

डॉ सुनील सिंह प्रोफेसर जोनपुर विश्वविद्यालय ने कहा कि हमें यह समझना चाहिए कि भारत में आतंकवाद का नामों निशान भी नहीं है। जो भारतीय मुस्लिम कट्टर इस्लाम के झांसे में आए भी, बहुत जल्द वह इसकी भावना को समझकर वापस सूफ़ी विचारधारा में लौट आए। दुनिया में सर्वाधिक मुस्लिम आबादी होने के बावजूद वहाबी आतंकवाद में भारत के नौजवानों को आप नहीं देखेंगे।

डॉ सुनील सिंह ने कहा कि युवाओं को सूफ़ी संतों के संदेशों को समझना चाहिए। सूफ़ियों की परम्परा स्व से पूर्व समाज, ख़ुद से पहले आप और इच्छा से पूर्व कल्याण की रही है। यह बात राष्ट्र निर्माण और समाज के कल्याण पर भी लागू होती है। डॉ सुनील सिंह ने युवाओं से अपील की कि वह सामाजिक कल्याण और सामूहिक विकास के लिए आगे आएं और वैश्विक शांति की स्थापना के लिए भारत को सबसे आगे खड़ा करने में सफल सहयोग दें।

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