Sunday, January 23, 2022

UN ने एनआरसी को बताया ‘मानवीय संकट’, भारत बोला – अल्पसंख्यको के अधिकारों से गलत तरह…

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संयुक्त राष्ट्र के एक विशेष प्रतिनिधि ने एनआरसी के चलते ‘मानवीय संकट’ की संभावना जताई है। संयुक्त राष्ट्र के अल्पसंख्यक मुद्दों के विशेष प्रतिनिधि फर्नांड डे वैरेनेस ने यह बात कही।

वैरेनेस ने महासभा की कमेटी में अपनी टिप्पणियों में कहा, ‘…मैं यह मुद्दा उठाते हुए दुखी हूं कि आगामी वर्षों तथा महीनों में राज्यविहीनता की स्थिति और आगे जा सकती है।’ उन्होंने कहा कि इससे ‘संभावित मानवीय संकट, अस्थिर स्थिति उत्पन्न हो सकती है क्योंकि भारत में हजारों तथा शायद लाखों बंगाली और मुस्लिम अल्पसंख्यकों को विदेशी माने जाने तथा असम राज्य के नागरिक न माने जाने का जोखिम है और इसलिए वे खुद को राज्यविहीनता की स्थिति में पा सकते हैं।’

हालांकि अब भारत ने कहा है कि यह निराश करने वाला है कि असम की राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) को गलत तरह से अल्पसंख्यक अधिकारों के मुद्दे से जोड़ा जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन में प्रथम सचिव पौलोमी त्रिपाठी ने कहा कि एनआरसी को अद्यतन करना उच्चतम न्यायालय के आदेश और निगरानी वाली संवैधानिक, पारदर्शी तथा कानूनी प्रक्रिया है।

त्रिपाठी ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा की थर्ड कमेटी (सामाजिक, मानवीय और सांस्कृतिक) के एक सत्र में कहा, ‘भारत के असम राज्य में राष्ट्रीय नागरिक पंजी का मुद्दा अल्पसंख्यकों के अधिकारों का मुद्दा नहीं है। हम निराश हैं कि इस मुद्दे को गलत तरीके से अल्पसंख्यक अधिकारों के मुद्दे से जोड़ा जा रहा है। भारत में अल्पसंख्यकों को संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है जो हमारे मौलिक अधिकारों का हिस्सा है और जो न्यायोचित है।’

त्रिपाठी ने कहा, ”अपूर्ण समझ के आधार पर किसी गलत निष्कर्ष पर पहुंचने की जगह न्यायिक प्रक्रिया को पूरा होने देना चाहिए। उन्होंने कहा, ”यह भेदभाव रहित प्रक्रिया है, जैसा कि डेटा प्रविष्टि के फॉर्म से देखा जा सकता है।” त्रिपाठी ने जोर देकर कहा कहा कि फॉर्म में धार्मिक जुड़ाव के बारे में जानकारी देने से संबंधित कोई कॉलम नहीं है। उन्होंने कहा कि सूची से छूटे किसी भी व्यक्ति के पास इस चरण में संबंधित न्यायाधिकरणों में अपील करने का अधिकार है और न्यायाधिकरण के फैसले से असंतुष्ट लोगों के पास उच्च न्यायालय तथा उच्चतम न्यायालय जाने का अधिकार है।

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