सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अंतिम सुनवाई के लिए 11 मई की तारीख तय कर दी गई. इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने यूनिफॉर्म सिविल कोड पर सुनवाई नहीं करने की बात कही है.

सर्वोच्च अदालत ने कहा कि वह एक आदेश पारित करेगा. तीन तलाक को लेकर जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई 11 मई तक शुरु कर देगा. चीफ जस्टिस जेएस खेहर, जस्टिस एनवी रमणा और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने मामले से जुड़े वकीलों से कहा कि वह साथ में बैठे और मुद्दे को आखिरी रूप दें. 16 फरवरी को कोर्ट में मुद्दे तय होंगे और 11 मई से मामले की सुनवाई शुरू होगी.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे से जुड़े लोगों को साफ किया कि वह इस मामले में किसी विशेष केस के तथ्यात्मक पहलुओं पर विचार नहीं करेगा. वह सिर्फ कानूनी मुद्दे को देखेगा. पीठ ने कहा कि हमारी तथ्यों को देखने में रुचि नहीं है. हम सिर्फ इसके कानूनी पहलुओं को देखेंगे.

मुस्लिम परिवार में शादीे करने के इच्छुक है तो अभी फोटो देखकर अपना जीवन साथी चुने (फ्री)- क्लिक करें 

पीठ ने कहा कि ये एक ऐसा मामला है, जिसमें मानवाधिकार का मुद्दा भी हो सकता है. ये मामला दूसरे मामलों पर भी असर डाल सकता है. हम इस मामले में कॉमन सिविल कोड पर बहस नहीं कर रहे. सुप्रीम कोर्ट की ओर से कहा गया कि कि वो मुस्लिम लॉ के तहत तीन तलाक का मुद्दा नहीं देखेगा. सर्वोच्च अदालत मामले में कानूनी पहलू पर ही फैसला देगा.

पिछली सुनवाई के दौरान ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में एक और हलफनामा दाखिल कर केंद्र की दलीलों का विरोध किया था. बोर्ड ने कहा था कि ट्रिपल तलाक को महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन बताने वाले केंद्र सरकार का रुख गलत है. पर्सनल लॉ को मौलिक अधिकार के रुप में चुनौती नहीं दी जा सकती है.

उनके मुताबिक ट्रिपल तलाक, निकाह जैसे मुद्दे पर कोर्ट अगर सुनवाई करता है तो ये जूडिशियल लेजिस्लेशन की तरह होगा. केंद्र सरकार ने इस मामले में जो स्टैंड लिया है कि इन मामलों को दोबारा देखा जाना चाहिए ये बेकार का स्टैंड है. पर्सनल लॉ बोर्ड का स्टैंड है कि मामले में दाखिल याचिका खारिज किया जाना चाहिए क्योंकि याचिका में जो सवाल उठाए गए हैं वो जूडिशियल रिव्यू के दायरे में नहीं आते. हलफनामे में पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा कि पर्सनल लॉ को चुनौती नहीं दी जा सकती.

Loading...