अंग्रेज़ी के अग्रणी अख़बार टाइम्स ऑफ इंडिया ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के ख़िलाफ झूठी एवं भ्रामक ख़बर छापने के लिए अदालत में माफी मांगी ली है। अख़बार ने दिल्ली की एक सिविल अदालत में अपना माफीनामा दाख़िल किया है।

दरअसल सितंबर 2007 में टाइम्स ऑफ इंडिया ने एएमयू को लेकर एक लीड स्टोरी छापी थी। अखिलेश कुमार सिंह की इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि यूनीवर्सिटी में शिक्षा और शोध का स्तर बेहद घटिया है। इस स्टोरी में कहा गया कि शमशाद मार्केट और चुंगी पर कई दुकान हैं जहां रिसर्च पेपर और डिज़र्टेशन टाफी की तरह बिकते हैं। छात्र इन्हें ख़रीद कर जमा कर देते हैं और यूनीवर्सिटी बिना इनको जांचे छात्रों को एम फिल और पीएचडी की डिग्री बांट देती है।

इस रिपोर्ट के ख़िलाफ छात्रों मे काफी ग़ुस्सा था। हालाँकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसके ख़िलाफ कुछ नहीं किया। आख़िरकार एएमयू छात्र संघ के सचिव रहे डा फर्रुख़ ख़ान एडवोकेट ने इस इस अख़बार को सबक़ सिखाने की ठानी। उन्होंने अपने साथी वकील चंगेज़ ख़ान के साथ मिलकर अख़बार के ख़िलाफ मुक़दमा कर दिया। मुक़दमा 14 साल चला।

आख़िर में अख़बार को अपनी फर्ज़ी रिपोर्टिंग के लिए माफी मांगनी पड़ी। बीती 14 जनवरी को अख़बार ने अपने वकील के माध्यम से चुपचाप दिल्ली की सिविल कोर्ट में अपना माफीनामा दाख़िल कर दिया। 20 जनवरी को जब मामले की सुनवाई की अगली तारीख़ पड़ तो पता चला कि अख़बार ने इस मामले मे माफी मांग ली है।

डॉ फर्रुख़ का कहना है कि इस मामले में यूनीवर्सिटी और ओल्ड ब्याएज़ एसोसिएशन चलाने वालों को आगे आना चाहिए था लेकिन कोई नहीं आया। मामला लंबा चला लेकिन इसका सबक़ ये है कि लड़ाई लड़ने का नतीजा ज़रुर आता है। ऐसे मामलों में अगर चुप्पी साथ ली जाए तो अपराध करने वाले की हिम्मत बढ़ती है। लेकिन अगर अदालत में लड़ाई ले जाई जाए तो बड़े से बड़े संस्थान की हिम्मत आख़िर मे जवाब दे जाती है।