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बुकर पुरस्कार विजेता लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधति रॉय ने भारत में भीड़तंत्र के बढ़ते प्रभाव को लेकर अपना डर का माहौल बना दिया है. उन्होंने कहा कि ऐसा भीड़तंत्र देश में अभिव्यक्ति की आजादी के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है.

साल 1997 में अपने पहले उपन्यास ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ के लिए बुकर पुरस्कार से नवाजी जाने वाली रॉय के खिलाफ उनके लेखन को लेकर अदालत में मुकदमा दायर किया गया था.

उन्होंने शनिवार को यहां नूर इनायत खान स्मारक में कहा, ‘सेंसरशिप करने का काम अब भीड़ के जिम्मे कर दिया गया है. हमारे यहां इस तरह के कई समूह हैं जो अपने ढंग से अपनी पहचान पेश करते हैं, अपना प्रवक्ता नियुक्त करते हैं, अपना इतिहास तय करते हैं, अपना इतिहास गढ़ते हैं और फिर सिनेमाघरों में आगजनी, लोगों पर हमला, किताबें जलाना और लोगों की हत्या करना शुरू कर देते हैं.’

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दिल्ली की इस लेखिका ने कहा कि साहित्य और कला के अन्य रूपों पर भीड़ की हिंसा और हमले, उनके ऊपर लगाए गए मुकदमों से ज्यादा डरावने हैं. गौरतलब है कि नूर इनायत खान ने द्वितीय विश्व युद्ध में एक अहम भूमिका निभाई थी.

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