सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि ईसाइयों के पर्सनल लॉ के तहत चर्च से मिले तलाक को कानूनी रूप से मान्यता देने से इनकार कर दिया हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंडियन डाइवोर्स एक्ट के तहत मान्यता प्राप्त अदालतें ही तलाक दे सकती है. चर्च कोर्ट से दिये जाने वाले तलाक की डिग्री की कोई कानूनी मान्यता नहीं है.

चीफ जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने कर्नाटक कैथलिक एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष सी पाइस की याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि ईसाईयों के ऊपर इंडियन डाइवोर्स एक्ट लागू है. इसके तहत सिर्फ कानूनी अदालतों को ही तलाक पर आदेश देने का अधिकार है.

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दरअसल, कर्नाटक कैथोलिक एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष क्लेरेंस पेस ने याचिका में मांग की गई थी कि चर्च से मिले तलाक पर सिविल कोर्ट की मुहर की बाध्यता खत्म कर दी जाए. याचिककर्ता का कहना है कि इस्लाम में तीन तलाक को मान्यता है तो क्रिश्चियन लॉ के तहत किए जाने वाले निर्णयों को भी वैध माना जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की उस दलील को मान लिया जिसमें 1996 के सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का हवाला दिया गया था कि किसी भी धर्म के पर्सनल लॉ देश के वैधानिक कानूनों पर हावी नहीं हो सकते. यानी कैनन लॉ के तहत तलाक कानूनी रूप से मान्य नहीं होगा. कोर्ट ने कहा कि 1996 में मॉली जोसेफ बनाम जॉर्ज सेबेस्टियन केस में इस बाबत व्यवस्था दी जा चुकी है.

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिककर्ता की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती क्योंकि इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट, 1872 और तलाक अधिनियम, 1869 पहले से लागू है. ऐसे में तलाक की इजाजत चर्च कोर्ट से नहीं दी जा सकती.

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