अयोध्या विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दोनों पक्षों को सुलह-समझोता कर मामलें को सुलझाने की दी गई सलाह को श्रीराम जन्मभूमि न्यास ने भी ठुकरा दिया हैं.

श्रीराम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास ने इस बारें में कहा कि श्रीराम जन्म भूमि को लेकर सुलह समझौते का अब कोई औचित्य नहीं है. उन्होंने कहा कि न्यायालय साक्ष्य मांगता है? जो हिन्दुओं के पक्ष में है. फिर बातचीत कैसी और क्यों? उन्होंने कहा, बातचीत जैसे निर्थक आलाप से हिन्दुओं को भ्रमित ना किया जाए.

उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का यह देश सम्मान करता है परन्तु सुझाव का अब कोई औचित्य नही है. न्यायालय के प्रति पीड़ित की बड़ी उम्मीद रहती है परन्तु यहां पर पीड़ित को ही सुझाव दिया जा रहा है कि वह सुलह समझौता का प्रयास करे.

महंत ने कहा कि सम्पूर्ण अयोध्या श्रीराम की है और जहां भगवान का प्रकटीकरण हुआ वही रामलला की जन्मभूमि है. अदालत में संपत्ति का मामला विचाराधीन था. साक्ष्य और वर्तमान स्थिति सब रामलला के पक्ष में हैं फिर भी न्यायायिक विलंब? 67 वर्ष के इस काल खंड मे ना जाने कितने गवाह और ना जाने कितने पक्ष-विपक्ष के लोग कालकलवित हो गये और फैसला तो दूर जहां से चले वहीं आकर पुनः खड़े हो गये ?

उन्होंने कहा कि इस देश में सरकारें आईं और गईं और अनेक समाधान का प्रयास किया गया परंतु तुष्टीकरण के कारण वह सफल नहीं हुये. जब 2010 में उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों के आधार पर निर्णय दिया भी तो उसने संमपति के स्वामित्व की जगह विभाजन कर दिया. हिन्दुओं ने स्वामित्व की अपील की थी ना की संपति के बंटवारे की. उन्होंने कहा कि आज पुनः उसी स्थान पर वापसी अब उचित नहीं है.

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